डाली है ख़ुद पे ज़ुल्म की यूँँ इक मिसाल और उस के बग़ैर काट दिया एक साल और
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हुई मुद्दत कि 'ग़ालिब' मर गया पर याद आता है वो हर इक बात पर कहना कि यूँँ होता तो क्या होता
Mirza Ghalib
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इलाज अपना कराते फिर रहे हो जाने किस किस से मोहब्बत कर के देखो ना मोहब्बत क्यूँँ नहीं करते
Farhat Ehsaas
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लोग हर मोड़ पे रुक रुक के सँभलते क्यूँँ हैं इतना डरते हैं तो फिर घर से निकलते क्यूँँ हैं मोड़ होता है जवानी का सँभलने के लिए और सब लोग यहीं आ के फिसलते क्यूँँ हैं
Rahat Indori
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ख़ुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहले ख़ुदा बंदे से ख़ुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है
Allama Iqbal
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होश वालों को ख़बर क्या बे-ख़ुदी क्या चीज़ है इश्क़ कीजे फिर समझिए ज़िंदगी क्या चीज़ है
Nida Fazli
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जब बुलंदी का गुमाँ था तो नहीं याद आई अपनी परवाज़ से टूटे तो ज़मीं याद आई वही आँखें कि जो ईमान-शिकन आँखें हैं उन्हीं आँखों की हमें दावत-ए-दीं याद आई
Subhan Asad
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ये मेरी ज़िद ही ग़लत थी कि तुझ सेा बन जाऊँ मैं अब न अपनी तरह हूँ न तेरे जैसा हूँ हमारे बीच ज़माने की बद-गुमानी है मैं ज़िंदगी से ज़रा कम ही बात करता हूँ
Subhan Asad
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तू ने सोचा भी है जानाँ कि तेरे वादे ने कितनी सदियों से नहीं पहना अमल का पैकर
Subhan Asad
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ये सानिहा भी शब-ए-हिज्र आ पड़ा हम पर तेरा ख़याल तो आया तेरी तलब न हुई
Subhan Asad
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उस ने ये कहके मुझे छोड़ दिया हाशिया छोड़ दिया जाता है
Subhan Asad
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