देखलें अपना गिरेबाँ जो ज़माने वाले फिर किसी शख़्स पा उँगली न उठाएगा कोई
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ये अलग बात कि ख़ामोश खड़े रहते हैं फिर भी जो लोग बड़े हैं, वो बड़े रहते हैं
Rahat Indori
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प्यार दो बार थोड़ी होता है हो तो फिर प्यार थोड़ी होता है यही बेहतर है तुम उसे रोको मुझ सेे इनकार थोड़ी होता है
Zubair Ali Tabish
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लोग हर मोड़ पे रुक रुक के सँभलते क्यूँँ हैं इतना डरते हैं तो फिर घर से निकलते क्यूँँ हैं मोड़ होता है जवानी का सँभलने के लिए और सब लोग यहीं आ के फिसलते क्यूँँ हैं
Rahat Indori
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राम कथा में जाने वाले लाखों लोग राम के जैसा बनने वाला एक नहीं
Tanoj Dadhich
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और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा
Faiz Ahmad Faiz
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नुसरत-ए-हक़ देखना आशूर तक ले जाएगी हसरत-ए-दीदार कोह-ए-तूर तक ले जाएगी
''Akbar Rizvi"
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जिस सेे डरते थे ज़माने के सितमगर सारे आज के दौर का वो मालिक-ए-अश्तर न रहा
''Akbar Rizvi"
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बस ऐसे इलाके को नज़र ढूॅंढ रही है दरिया जहाँ मिलता है समुंदर नहीं मिलता
''Akbar Rizvi"
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किसी परिंद ने थोड़ी उड़ान की ख़ातिर ज़मीर बेच दिया और सुकून बेच दिया
''Akbar Rizvi"
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दूर अहबाब से रहता हूँ यूँँ ही तो अकबर न पता कौन सा इक ज़ख़्म नया मिल जाए
''Akbar Rizvi"
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