हर साल की आख़िरी शामों में दो चार वरक़ उड़ जाते हैं अब और न बिखरे रिश्तों की बोसीदा किताब तो अच्छा हो
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कोई दिक़्क़त नहीं है गर तुम्हें उलझा सा लगता हूँ मैं पहली मर्तबा मिलने में सब को ऐसा लगता हूँ ज़रूरी तो नहीं हम साथ हैं तो कोई चक्कर हो वो मेरी दोस्त है और मैं उसे बस अच्छा लगता हूँ
Ali Zaryoun
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शाख़ों से टूट जाएँ वो पत्ते नहीं हैं हम आँधी से कोई कह दे कि औक़ात में रहे
Rahat Indori
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सोचूँ तो सारी उम्र मोहब्बत में कट गई देखूँ तो एक शख़्स भी मेरा नहीं हुआ
Jaun Elia
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तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है
Faiz Ahmad Faiz
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बंसी सब सुर त्यागे है, एक ही सुर में बाजे है हाल न पूछो मोहन का, सब कुछ राधे राधे है
Zubair Ali Tabish
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गलियों की उदासी पूछती है घर का सन्नाटा कहता है इस शहर का हर रहने वाला क्यूँँ दूसरे शहर में रहता है
Ghulam Mohammad Qasir
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अब इक तीर भी हो लिया साथ वर्ना परिंदा चला था सफ़र पर अकेले
Ghulam Mohammad Qasir
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मिरे दिए ने अँधेरे से दोस्ती कर ली मुझे तू अपने उजाले में जानता है तो आ
Ghulam Mohammad Qasir
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कश्ती भी नहीं बदली दरिया भी नहीं बदला और डूबने वालों का जज़्बा भी नहीं बदला
Ghulam Mohammad Qasir
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जिस को इस फ़स्ल में होना है बराबर का शरीक मेरे एहसास में तन्हाइयाँ क्यूँँ बोता है
Ghulam Mohammad Qasir
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