गलियों की उदासी पूछती है घर का सन्नाटा कहता है इस शहर का हर रहने वाला क्यूँँ दूसरे शहर में रहता है
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तुझे कैसे इल्म न हो सका बड़ी दूर तक ये ख़बर गई तिरे शहर ही की ये शाएरा तिरे इंतिज़ार में मर गई
Mumtaz Naseem
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अपना सब कुछ हार के लौट आए हो न मेरे पास मैं तुम्हें कहता भी रहता था कि दुनिया तेज़ है
Tehzeeb Hafi
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मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के, ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से, मोहब्बत हो गई तुम से
Zubair Ali Tabish
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उदासी का सबब दो चार ग़म होते तो कह देता फ़ुलाँ को भूल बैठा हूँ फ़ुलाँ की याद आती है
Ashu Mishra
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दौलत शोहरत बीवी बच्चे अच्छा घर और अच्छे दोस्त कुछ तो है जो इन के बा'द भी हासिल करना बाक़ी है कभी-कभी तो दिल करता है चलती रेल से कूद पड़ूॅं फिर कहता हूँ पागल अब तो थोड़ा रस्ता बाक़ी है
Zia Mazkoor
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अब इक तीर भी हो लिया साथ वर्ना परिंदा चला था सफ़र पर अकेले
Ghulam Mohammad Qasir
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हर साल की आख़िरी शामों में दो चार वरक़ उड़ जाते हैं अब और न बिखरे रिश्तों की बोसीदा किताब तो अच्छा हो
Ghulam Mohammad Qasir
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जिस को इस फ़स्ल में होना है बराबर का शरीक मेरे एहसास में तन्हाइयाँ क्यूँँ बोता है
Ghulam Mohammad Qasir
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तुम यूँँ ही नाराज़ हुए हो वर्ना मय-ख़ाने का पता हम ने हर उस शख़्स से पूछा जिस के नैन नशीले थे
Ghulam Mohammad Qasir
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अब उसी आग में जलते हैं जिसे अपने दामन से हवा दी हम ने
Ghulam Mohammad Qasir
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