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रातें किसी याद में कटती हैं और दिन दफ़्तर खा जाता है दिल जीने पर माएल होता है तो मौत का डर खा जाता है सच पूछो तो 'तहज़ीब हाफ़ी' मैं ऐसे दोस्त से आज़िज़ हूँ मिलता है तो बात नहीं करता और फोन पे सर खा जाता है

Tehzeeb Hafi

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के 'हैलो' सुनते ही कट कर दिया है उस ने मेरा फ़ोन ख़ुदा का शुक्र है आवाज़ तो पहचानता है वो

Zubair Ali Tabish

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राम होने में या रावण में है अंतर इतना एक दुनिया को ख़ुशी दूसरा ग़म देता है हम ने रावण को बरस दर बरस जलाया है कौन है वो जो इसे फिर से जनम देता है

Kumar Vishwas

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न हुआ नसीब क़रार-ए-जाँ हवस-ए-क़रार भी अब नहीं तिरा इंतिज़ार बहुत किया तिरा इंतिज़ार भी अब नहीं तुझे क्या ख़बर मह-ओ-साल ने हमें कैसे ज़ख़्म दिए यहाँ तिरी यादगार थी इक ख़लिश तिरी यादगार भी अब नहीं

Jaun Elia

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चेहरा धुँदला सा था और सुनहरे झुमके थे बादल ने कानों में चाँद के टुकड़े पहने थे इक दूजे को खोने से हम इतना डरते थे ग़ुस्सा भी होते तो बातें करते रहते थे

Vikram Gaur Vairagi

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