कल दोपहर अजीब इक बे-दिली रही बस तिल्लियाँ जलाकर बुझाता रहा हूँ मैं
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सैर कर दुनिया की ग़ाफ़िल ज़िंदगानी फिर कहाँ ज़िंदगी गर कुछ रही तो ये जवानी फिर कहाँ
Khwaja Meer Dard
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आदमी देश छोड़े तो छोड़े 'अली' दिल में बसता हुआ घर नहीं छोड़ता एक मैं हूँ कि नींदें नहीं आ रही एक तू है कि बिस्तर नहीं छोड़ता
Ali Zaryoun
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निगाहें फेर ली घबरा के मैं ने वो तुम से ख़ूब-सूरत लग रही थी
Fahmi Badayuni
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ग़म-ए-फ़ुर्क़त का शिकवा करने वाली मेरी मौजूदगी में सो रही है
Jaun Elia
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कुछ तो मजबूरियाँ रही होंगी यूँँ कोई बे-वफ़ा नहीं होता
Bashir Badr
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मुस्कुराए हम उस से मिलते वक़्त रो न पड़ते अगर ख़ुशी होती
Jaun Elia
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जो रा'नाई निगाहों के लिए सामान-ए-जल्वा है लिबास-ए-मुफ़्लिसी में कितनी बे-क़ीमत नज़र आती यहाँ तो जाज़बिय्यत भी है दौलत ही की पर्वर्दा ये लड़की फ़ाक़ा-कश होती तो बद-सूरत नज़र आती
Jaun Elia
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बस यूँँ ही मेरा गाल रखने दे मेरी जान आज गाल पर अपने
Jaun Elia
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ख़र्च चलेगा अब मेरा किस के हिसाब में भला सब के लिए बहुत हूँ मैं अपने लिए ज़रा नहीं
Jaun Elia
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इक महक सिम्त ए दिल से आई थी मैं ये समझा तेरी सवारी है
Jaun Elia
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