ख़ाक बस्तियों में घर रेत के बनाओगे रोज़ रोज़ ऐसे ही ख़ूब चोट खाओगे सोचते तो हैं हम भी छत से कूद जाएँ अब फिर ख़याल आता है तुम कहाँ पे जाओगे जो हमारे हो कर भी हर किसी को देखोगे बे-वफ़ा की गिनती में यार आ ही जाओगे बे-नक़ाब होकर के हम निकल तो आएँगे हो गया कहीं कुछ भी हमपे टिन-टिनाओगे शब के आठ बजते ही तुम कहाँ पे जाते हो कोई पूछ बैठा फिर बोलो क्या बताओगे जब रक़ीब बनकर ही कुछ नहीं हुआ तुम सेे तुम हबीब बनकर क्या बस्तियाँ जलाओगे जब नज़र झुकाओगे बात बन ही जाएगी प्यार से जो बोलेंगे तुम भी मान जाओगे इश्क़ का मुहब्बत का जब बुख़ार आएगा वक़्त पर दवा लेना ख़ुद ही भूल जाओगे जब कभी भी तन्हाई नोच कर के खाएगी मेरा नाम लिख कर तुम हाथ पर मिटाओगे दास्ताँ मोहब्बत की एक बार सुन लोगे मेरा नाम गीतों में तुम भी गुन-गुनाओगे
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तुम्हें हुस्न पर दस्तरस है मोहब्बत वोहब्बत बड़ा जानते हो तो फिर ये बताओ कि तुम उस की आँखों के बारे में क्या जानते हो ये जुग़राफ़िया फ़ल्सफ़ा साईकॉलोजी साइंस रियाज़ी वग़ैरा ये सब जानना भी अहम है मगर उस के घर का पता जानते हो
Tehzeeb Hafi
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हम वो हैं जो ख़ुदा को भूल गए तुम मेरी जान किस गुमान में हो
Jaun Elia
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किसी को घर से निकलते ही मिल गई मंज़िल कोई हमारी तरह उम्र भर सफ़र में रहा
Ahmad Faraz
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बिछड़ कर उस का दिल लग भी गया तो क्या लगेगा वो थक जाएगा और मेरे गले से आ लगेगा मैं मुश्किल में तुम्हारे काम आऊँ या ना आऊँ मुझे आवाज़ दे लेना तुम्हें अच्छा लगेगा
Tehzeeb Hafi
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किसी गली में किराए पे घर लिया उस ने फिर उस गली में घरों के किराए बढ़ने लगे
Umair Najmi
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दिल ख़ुश-गवार भी है तिरा बे-क़रार भी कुछ कुछ तो लग रहा है हमें उस्तुवार भी हरदम उन्हीं के रहते हो घर में घुसे हुए ऊपर से बन रहे हो बड़े नाक-दार भी करता हूँ दो शिकार मैं तो एक तीर से फ़न गीतकार भी है मिरा हुस्न-कार भी तुम ने नहीं कहा था जहाँ छोड़ दे अभी ऊपर से कर रहे हो मिरा इंतिज़ार भी तुम लोग कह रहे हो भला आदमी उसे मुझ को नज़र से लग रहा है 'ऐब-दार भी मुझ पर ही मेरी जान का इल्ज़ाम धर दिया ऊपर से बोलते हो मुझे ग़म-गुसार भी हरदम नमक लगाना ग़रीबों के ज़ख़्म पर ये तेरा काम-काज है और रोज़गार भी
Prashant Kumar
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कुछ लोग ज़माने में हम नाम निकल आए जो ख़ास सभी से थे वो 'आम निकल आए है सब सेे जुदा तेरा अंदाज़ तबस्सुम का जो एक हँसी में दो गुलफ़ाम निकल आए जो सब को सिखाते थे इकराम मुहब्बत का उन पर ही मुहब्बत के इल्ज़ाम निकल आए जो सब को बताते थे मैं अजनबी हूँ कोई वो नाम से मेरे ही बदनाम निकल आए तू अहल-ए-ज़मीं से सुन हर बात बना के रख कुछ भी न पता किस सेे क्या काम निकल आए
Prashant Kumar
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मिरे अंदाज़ ज़माने से निराले होंगे आज अँधेरे हैं तो क्या कल को उजाले होंगे एक रोटी में सुनाते हैं तुझे कितना कुछ कल से होंटों पे तिरे मेरे निवाले होंगे कम से कम सैकड़ों को भूख ने मारा होगा बच गए जितने सभी दर्द ने पाले होंगे अब हमें मौत भी मक़बूल नहीं करती है ज़िंदगी तू ही बता किस के हवाले होंगे हर दफ़ा छीन लिया मेरा निवाला सबने फिर तो बच्चे भी तिरे भूख ने पाले होंगे अरे कमरे में मिरे कुछ भी नहीं है सच्ची चार दीवार मिलेंगी बचे जाले होंगे शहर-ए-दिल में सुनो तो कोई नहीं रहता है तुम कहाँ जा रहे हो सब में ही ताले होंगे छोड़ के ख़ुद को ज़माने को दिया है मरहम फिर तो बेशक ही तिरे पाँव में छाले होंगे
Prashant Kumar
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ज़माने के ज़ुल्म-ओ-सितम देख लो मिरी ज़िंदगी के भी ग़म देख लो क़यामत से बढ़कर रहे हैं सभी कमर के न मानो तो ख़म देख लो मोहब्बत तो करने चले हो मगर मोहब्बत में क्या-क्या हैं ग़म देख लो ये ख़ंजर चलाने से पहले सुनो मिरा हाल तो कम से कम देख लो अरे अब के ज़ाहिद भी पीने लगे न मानो तो दैर-ओ-हरम देख लो
Prashant Kumar
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हुस्न वालों में सभी को शंग होना चाहिए और इस के साथ ही नव-रंग होना चाहिए अंजुमन में आएँगे तो दाद भी देंगे मगर हर सुख़न-वर शर्त है ख़ुद-रंग होना चाहिए मैं ज़माने में अगर मंसूब था तो तुम सेे था क़ब्र में भी तुम को मेरे संग होना चाहिए तीस दिन में एक दिन ही दिल पे दस्तक देते हो इश्क़ करने का कोई तो ढंग होना चाहिए मुझ सेे ही मंसूब है इस मुल्क की मिट्टी तो फिर इस तिरंगे में भी मेरा अंग होना चाहिए
Prashant Kumar
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