ज़माने के ज़ुल्म-ओ-सितम देख लो मिरी ज़िंदगी के भी ग़म देख लो क़यामत से बढ़कर रहे हैं सभी कमर के न मानो तो ख़म देख लो मोहब्बत तो करने चले हो मगर मोहब्बत में क्या-क्या हैं ग़म देख लो ये ख़ंजर चलाने से पहले सुनो मिरा हाल तो कम से कम देख लो अरे अब के ज़ाहिद भी पीने लगे न मानो तो दैर-ओ-हरम देख लो
Related Sher
परों को खोल ज़माना उड़ान देखता है ज़मीं पे बैठ के क्या आसमान देखता है
Shakeel Azmi
283 likes
गले तो लगना है उस से कहो अभी लग जाए यही न हो मेरा उस के बग़ैर जी लग जाए मैं आ रहा हूँ तेरे पास ये न हो कि कहीं तेरा मज़ाक़ हो और मेरी ज़िंदगी लग जाए
Tehzeeb Hafi
267 likes
और फिर एक दिन बैठे बैठे मुझे अपनी दुनिया बुरी लग गई जिस को आबाद करते हुए मेरे मां-बाप की ज़िंदगी लग गई
Tehzeeb Hafi
207 likes
नहीं लगेगा उसे देख कर मगर ख़ुश है मैं ख़ुश नहीं हूँ मगर देख कर लगेगा नहीं
Umair Najmi
201 likes
ये मैं ने कब कहा कि मेरे हक़ में फ़ैसला करे अगर वो मुझ से ख़ुश नहीं है तो मुझे जुदा करे मैं उस के साथ जिस तरह गुज़ारता हूँ ज़िंदगी उसे तो चाहिए कि मेरा शुक्रिया अदा करे
Tehzeeb Hafi
206 likes
More from Prashant Kumar
दिल ख़ुश-गवार भी है तिरा बे-क़रार भी कुछ कुछ तो लग रहा है हमें उस्तुवार भी हरदम उन्हीं के रहते हो घर में घुसे हुए ऊपर से बन रहे हो बड़े नाक-दार भी करता हूँ दो शिकार मैं तो एक तीर से फ़न गीतकार भी है मिरा हुस्न-कार भी तुम ने नहीं कहा था जहाँ छोड़ दे अभी ऊपर से कर रहे हो मिरा इंतिज़ार भी तुम लोग कह रहे हो भला आदमी उसे मुझ को नज़र से लग रहा है 'ऐब-दार भी मुझ पर ही मेरी जान का इल्ज़ाम धर दिया ऊपर से बोलते हो मुझे ग़म-गुसार भी हरदम नमक लगाना ग़रीबों के ज़ख़्म पर ये तेरा काम-काज है और रोज़गार भी
Prashant Kumar
3 likes
कुछ लोग ज़माने में हम नाम निकल आए जो ख़ास सभी से थे वो 'आम निकल आए है सब सेे जुदा तेरा अंदाज़ तबस्सुम का जो एक हँसी में दो गुलफ़ाम निकल आए जो सब को सिखाते थे इकराम मुहब्बत का उन पर ही मुहब्बत के इल्ज़ाम निकल आए जो सब को बताते थे मैं अजनबी हूँ कोई वो नाम से मेरे ही बदनाम निकल आए तू अहल-ए-ज़मीं से सुन हर बात बना के रख कुछ भी न पता किस सेे क्या काम निकल आए
Prashant Kumar
4 likes
मिरे अंदाज़ ज़माने से निराले होंगे आज अँधेरे हैं तो क्या कल को उजाले होंगे एक रोटी में सुनाते हैं तुझे कितना कुछ कल से होंटों पे तिरे मेरे निवाले होंगे कम से कम सैकड़ों को भूख ने मारा होगा बच गए जितने सभी दर्द ने पाले होंगे अब हमें मौत भी मक़बूल नहीं करती है ज़िंदगी तू ही बता किस के हवाले होंगे हर दफ़ा छीन लिया मेरा निवाला सबने फिर तो बच्चे भी तिरे भूख ने पाले होंगे अरे कमरे में मिरे कुछ भी नहीं है सच्ची चार दीवार मिलेंगी बचे जाले होंगे शहर-ए-दिल में सुनो तो कोई नहीं रहता है तुम कहाँ जा रहे हो सब में ही ताले होंगे छोड़ के ख़ुद को ज़माने को दिया है मरहम फिर तो बेशक ही तिरे पाँव में छाले होंगे
Prashant Kumar
4 likes
ख़्वाबों में सही रोज़ सताने के लिए आ आ फिर से मिरे दिल को चुराने के लिए आ हर कोई समझता है मुझे काँच का मरहम कुछ और हूँ मैं इनको बताने के लिए आ हर बार तिरे बस में कहाँ मुझ को उठाना इस बार निगाहों से गिराने के लिए आ वो रात वही दिन वही तन्हाई का आलम आँखों में वही प्यास जगाने के लिए आ साँसों के चराग़ाँ तिरी ज़ुल्फ़ों ने बुझाए अब तू ही जनाज़े को उठाने के लिए आ इक तेरे सिवा था ही मिरा कौन जहाँ में सो क़ब्र की भी रस्म निभाने के लिए आ जिन दस्त-ए-मुबारक में मिरी जान बसी थी मस्जिद में वही हाथ उठाने के लिए आ
Prashant Kumar
4 likes
हुस्न वालों में सभी को शंग होना चाहिए और इस के साथ ही नव-रंग होना चाहिए अंजुमन में आएँगे तो दाद भी देंगे मगर हर सुख़न-वर शर्त है ख़ुद-रंग होना चाहिए मैं ज़माने में अगर मंसूब था तो तुम सेे था क़ब्र में भी तुम को मेरे संग होना चाहिए तीस दिन में एक दिन ही दिल पे दस्तक देते हो इश्क़ करने का कोई तो ढंग होना चाहिए मुझ सेे ही मंसूब है इस मुल्क की मिट्टी तो फिर इस तिरंगे में भी मेरा अंग होना चाहिए
Prashant Kumar
4 likes
Similar Writers
Our suggestions based on Prashant Kumar.
Similar Moods
More moods that pair well with Prashant Kumar's sher.







