sherKuch Alfaaz

ख़्वाबों में सही रोज़ सताने के लिए आ आ फिर से मिरे दिल को चुराने के लिए आ हर कोई समझता है मुझे काँच का मरहम कुछ और हूँ मैं इनको बताने के लिए आ हर बार तिरे बस में कहाँ मुझ को उठाना इस बार निगाहों से गिराने के लिए आ वो रात वही दिन वही तन्हाई का आलम आँखों में वही प्यास जगाने के लिए आ साँसों के चराग़ाँ तिरी ज़ुल्फ़ों ने बुझाए अब तू ही जनाज़े को उठाने के लिए आ इक तेरे सिवा था ही मिरा कौन जहाँ में सो क़ब्र की भी रस्म निभाने के लिए आ जिन दस्त-ए-मुबारक में मिरी जान बसी थी मस्जिद में वही हाथ उठाने के लिए आ

Related Sher

तुम्हें हुस्न पर दस्तरस है मोहब्बत वोहब्बत बड़ा जानते हो तो फिर ये बताओ कि तुम उस की आँखों के बारे में क्या जानते हो ये जुग़राफ़िया फ़ल्सफ़ा साईकॉलोजी साइंस रियाज़ी वग़ैरा ये सब जानना भी अहम है मगर उस के घर का पता जानते हो

Tehzeeb Hafi

1279 likes

हम वो हैं जो ख़ुदा को भूल गए तुम मेरी जान किस गुमान में हो

Jaun Elia

563 likes

किसी को घर से निकलते ही मिल गई मंज़िल कोई हमारी तरह उम्र भर सफ़र में रहा

Ahmad Faraz

594 likes

बिछड़ कर उस का दिल लग भी गया तो क्या लगेगा वो थक जाएगा और मेरे गले से आ लगेगा मैं मुश्किल में तुम्हारे काम आऊँ या ना आऊँ मुझे आवाज़ दे लेना तुम्हें अच्छा लगेगा

Tehzeeb Hafi

751 likes

मुझ से मत पूछो के उस शख़्स में क्या अच्छा है अच्छे अच्छों से मुझे मेरा बुरा अच्छा है किस तरह मुझ से मुहब्बत में कोई जीत गया ये न कह देना के बिस्तर में बड़ा अच्छा है

Tehzeeb Hafi

566 likes

More from Prashant Kumar

मिरे अंदाज़ ज़माने से निराले होंगे आज अँधेरे हैं तो क्या कल को उजाले होंगे एक रोटी में सुनाते हैं तुझे कितना कुछ कल से होंटों पे तिरे मेरे निवाले होंगे कम से कम सैकड़ों को भूख ने मारा होगा बच गए जितने सभी दर्द ने पाले होंगे अब हमें मौत भी मक़बूल नहीं करती है ज़िंदगी तू ही बता किस के हवाले होंगे हर दफ़ा छीन लिया मेरा निवाला सबने फिर तो बच्चे भी तिरे भूख ने पाले होंगे अरे कमरे में मिरे कुछ भी नहीं है सच्ची चार दीवार मिलेंगी बचे जाले होंगे शहर-ए-दिल में सुनो तो कोई नहीं रहता है तुम कहाँ जा रहे हो सब में ही ताले होंगे छोड़ के ख़ुद को ज़माने को दिया है मरहम फिर तो बेशक ही तिरे पाँव में छाले होंगे

Prashant Kumar

4 likes

ज़माने के ज़ुल्म-ओ-सितम देख लो मिरी ज़िंदगी के भी ग़म देख लो क़यामत से बढ़कर रहे हैं सभी कमर के न मानो तो ख़म देख लो मोहब्बत तो करने चले हो मगर मोहब्बत में क्या-क्या हैं ग़म देख लो ये ख़ंजर चलाने से पहले सुनो मिरा हाल तो कम से कम देख लो अरे अब के ज़ाहिद भी पीने लगे न मानो तो दैर-ओ-हरम देख लो

Prashant Kumar

4 likes

कुछ लोग ज़माने में हम नाम निकल आए जो ख़ास सभी से थे वो 'आम निकल आए है सब सेे जुदा तेरा अंदाज़ तबस्सुम का जो एक हँसी में दो गुलफ़ाम निकल आए जो सब को सिखाते थे इकराम मुहब्बत का उन पर ही मुहब्बत के इल्ज़ाम निकल आए जो सब को बताते थे मैं अजनबी हूँ कोई वो नाम से मेरे ही बदनाम निकल आए तू अहल-ए-ज़मीं से सुन हर बात बना के रख कुछ भी न पता किस सेे क्या काम निकल आए

Prashant Kumar

4 likes

दिल ख़ुश-गवार भी है तिरा बे-क़रार भी कुछ कुछ तो लग रहा है हमें उस्तुवार भी हरदम उन्हीं के रहते हो घर में घुसे हुए ऊपर से बन रहे हो बड़े नाक-दार भी करता हूँ दो शिकार मैं तो एक तीर से फ़न गीतकार भी है मिरा हुस्न-कार भी तुम ने नहीं कहा था जहाँ छोड़ दे अभी ऊपर से कर रहे हो मिरा इंतिज़ार भी तुम लोग कह रहे हो भला आदमी उसे मुझ को नज़र से लग रहा है 'ऐब-दार भी मुझ पर ही मेरी जान का इल्ज़ाम धर दिया ऊपर से बोलते हो मुझे ग़म-गुसार भी हरदम नमक लगाना ग़रीबों के ज़ख़्म पर ये तेरा काम-काज है और रोज़गार भी

Prashant Kumar

3 likes

ख़ाक बस्तियों में घर रेत के बनाओगे रोज़ रोज़ ऐसे ही ख़ूब चोट खाओगे सोचते तो हैं हम भी छत से कूद जाएँ अब फिर ख़याल आता है तुम कहाँ पे जाओगे जो हमारे हो कर भी हर किसी को देखोगे बे-वफ़ा की गिनती में यार आ ही जाओगे बे-नक़ाब होकर के हम निकल तो आएँगे हो गया कहीं कुछ भी हमपे टिन-टिनाओगे शब के आठ बजते ही तुम कहाँ पे जाते हो कोई पूछ बैठा फिर बोलो क्या बताओगे जब रक़ीब बनकर ही कुछ नहीं हुआ तुम सेे तुम हबीब बनकर क्या बस्तियाँ जलाओगे जब नज़र झुकाओगे बात बन ही जाएगी प्यार से जो बोलेंगे तुम भी मान जाओगे इश्क़ का मुहब्बत का जब बुख़ार आएगा वक़्त पर दवा लेना ख़ुद ही भूल जाओगे जब कभी भी तन्हाई नोच कर के खाएगी मेरा नाम लिख कर तुम हाथ पर मिटाओगे दास्ताँ मोहब्बत की एक बार सुन लोगे मेरा नाम गीतों में तुम भी गुन-गुनाओगे

Prashant Kumar

5 likes

Similar Writers

View All ›

Our suggestions based on Prashant Kumar.

Similar Moods

View All ›

More moods that pair well with Prashant Kumar's sher.