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किसी की बाँह भी ख़ाली नहीं की रो सकूँ जिस में तुम्हारे जिस्म से ये मन बहुत उक्ता गया सा है

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ये नदियाँ दूर तक जाए किनारे कम नहीं होते भला किस के दिलो में तुम कहो की ग़म नहीं होते यूँँ ही हर बात पर रुशवा अगर होने लगोगे तो कहो कैसे संभाले दिल भला क्यूँ हम नहीं रोते

Aryan Goswami

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ग़ज़ल है आत्मा फिर भी नज़ाकत की ज़रूरत है बूढ़ापो के मोहल्ले में शरारत की ज़रूरत है ये दुनिया जान कर भी कुछ नहीं करती मेरे ख़ातिर मुझे उस की ज़रूरत है उसे मेरी ज़रूरत है

Aryan Goswami

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ए ज़िंदगी तेरी फ़रमाहिशे किसी दिन जान ले के छोड़ेगी

Aryan Goswami

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मुझ सेे बिछड़ कर कहाँ लग रहा है बताओ ज़रा ये जहाँ लग रहा है उन्हीं से ख़ुश रहने की,की थी गुज़ारिश वो ख़ुश है तो देखो बुरा लग रहा है

Aryan Goswami

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पानी से पत्थर को कटते देखा है हम ने उस को रोज़ संवरते देखा है

Aryan Goswami

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