कोई दीवाना कहता है कोई पागल समझता है मगर धरती की बेचैनी को बस बादल समझता है
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अगर है इश्क़ सच्चा तो निगाहों से बयाँ होगा ज़बाँ से बोलना भी क्या कोई इज़हार होता है
Bhaskar Shukla
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तू मोहब्बत से कोई चाल तो चल हार जाने का हौसला है मुझे
Ahmad Faraz
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सौ सौ उमीदें बँधती है इक इक निगाह पर मुझ को न ऐसे प्यार से देखा करे कोई
Allama Iqbal
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वो नहीं मेरा मगर उस से मोहब्बत है तो है ये अगर रस्मों रिवाजों से बग़ावत है तो है
Deepti Mishra
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उलझ कर के तेरी ज़ुल्फ़ों में यूँँ आबाद हो जाऊँ कि जैसे लखनऊ का मैं अमीनाबाद हो जाऊँ मैं यमुना की तरह तन्हा निहारूँ ताज को कब तक कोई गंगा मिले तो मैं इलाहाबाद हो जाऊँ
Ashraf Jahangeer
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जिस्म चादर सा बिछ गया होगा रूह सिलवट हटा रही होगी
Kumar Vishwas
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दिल के तमाम ज़ख़्म तेरी हाँ से भर गए जितने कठिन थे रास्ते वो सब गुज़र गए
Kumar Vishwas
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चारों तरफ़ बिखर गईं साँसों की ख़ुशबुएँ राह-ए-वफ़ा में आप जहाँ भी जिधर गए
Kumar Vishwas
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हम कहाँ हैं ये पता लो तुम भी बात आधी तो सँभालो तुम भी
Kumar Vishwas
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रात के जिस्म में जब पहला पियाला उतरा दूर दरिया में मेरे चाँद का हाला उतरा
Kumar Vishwas
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