मुझ से कहा जिब्रील-ए-जुनूँ ने ये भी वही-ए-इलाही है मज़हब तो बस मज़हब-ए-दिल है बाक़ी सब गुमराही है
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कोई शहर था जिस की एक गली मेरी हर आहट पहचानती थी मेरे नाम का इक दरवाज़ा था इक खिड़की मुझ को जानती थी
Ali Zaryoun
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ये शहर-ए-अजनबी में अब किसे जा कर बताएँ हम कहाँ के रहने वाले हैं कहाँ की याद आती है
Ashu Mishra
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तू मोहब्बत से कोई चाल तो चल हार जाने का हौसला है मुझे
Ahmad Faraz
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प्यार दो बार थोड़ी होता है हो तो फिर प्यार थोड़ी होता है यही बेहतर है तुम उसे रोको मुझ सेे इनकार थोड़ी होता है
Zubair Ali Tabish
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वो दुल्हन बन के रुख़्सत हो गई है कहाँ तक कार का पीछा करोगे?
Zubair Ali Tabish
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सुनते हैं कि काँटे से गुल तक हैं राह में लाखों वीराने कहता है मगर ये अज़्म-ए-जुनूँ सहरा से गुलिस्ताँ दूर नहीं
Majrooh Sultanpuri
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बहाने और भी होते जो ज़िंदगी के लिए हम एक बार तेरी आरज़ू भी खो देते
Majrooh Sultanpuri
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इस बाग़ में वो संग के क़ाबिल कहा न जाए जब तक किसी समर को मेरा दिल कहा न जाए
Majrooh Sultanpuri
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अब कारगह-ए-दहर में लगता है बहुत दिल ऐ दोस्त कहीं ये भी तिरा ग़म तो नहीं है
Majrooh Sultanpuri
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बढ़ाई मय जो मोहब्बत से आज साक़ी ने ये काँपे हाथ कि साग़र भी हम उठा न सके
Majrooh Sultanpuri
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