न तारीख़ बदली न ही हाल बदला न बदली अदाएँ न ये साल बदला मेरा शहर बदला मेरा गाँव बदला न ही लोग बदले न सुरताल बदला
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वो जिस की छाँव में पच्चीस साल गुज़रे हैं वो पेड़ मुझ से कोई बात क्यूँँ नहीं करता
Tehzeeb Hafi
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साल के तीन सौ पैंसठ दिन में एक भी रात नहीं है उस की वो मुझे छोड़ दे और ख़ुश भी रहे इतनी औक़ात नहीं है उस की
Muzdum Khan
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मैं चाहता हूँ मोहब्बत मेरा वो हाल करे कि ख़्वाब में भी दोबारा कभी मजाल न हो
Jawwad Sheikh
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नहीं निगाह में मंज़िल तो जुस्तुजू ही सही नहीं विसाल मुयस्सर तो आरज़ू ही सही
Faiz Ahmad Faiz
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हज़ारों साल नर्गिस अपनी बे-नूरी पे रोती है बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदा-वर पैदा
Allama Iqbal
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ज़िंदगी में मोड़ कालिख़ आगे ऐसे आएँगे याद बातें आएँगी बिन ध्यान जो सुनता रहा
Saurabh Yadav Kaalikhh
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कहो यार 'कालिख़' कि क्या ही करोगे मुसलसल करेंगे सफ़र ज़िंदगी भर
Saurabh Yadav Kaalikhh
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ज़ख़्मी से दिन हैं आजकल 'कालिख़' यहाँ तुम याद जाने इस क़दर क्यूँँ आ रहे
Saurabh Yadav Kaalikhh
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थे बहुत शाही से उस के शौक़ मैं क्या बोलता जान को पिस्ता खिलाने में यहाँ पिसता रहा
Saurabh Yadav Kaalikhh
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यहाँ चेहरे सभी जैसे भरी ‘कालिख़’ बचे कुछ साफ़ उन में रंग भरने दो
Saurabh Yadav Kaalikhh
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