पाने को इक हसीं ख़्वाब का वो नगर बस भटकता रहा यूँँ नवी दर-ब-दर
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एक मुझे ख़्वाब देखने के सिवा चाय पीने की गंदी आदत है
Balmohan Pandey
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वो झूठ बोल रहा था बड़े सलीक़े से मैं ए'तिबार न करता तो और क्या करता
Waseem Barelvi
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इसी से जान गया मैं कि बख़्त ढलने लगे मैं थक के छाँव में बैठा तो पेड़ चलने लगे मैं दे रहा था सहारे तो इक हुजूम में था जो गिर पड़ा तो सभी रास्ता बदलने लगे
Farhat Abbas Shah
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जाने से कोई फ़र्क़ ही उस के नहीं पड़ा क्या क्या समझ रहा था बिछड़ने के डर को मैं
Shariq Kaifi
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न पूछो हुस्न की ता'रीफ़ हम से मोहब्बत जिस से हो बस वो हसीं है
Adil Farooqui
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ज़मीं पे आसमाँ पिघला हुआ ही पाओगे समय यूँँ हाथों से निकला हुआ ही पाओगे किसी के वास्ते ख़ुद को सँवार कर देखो तुम अपने आप को बदला हुआ ही पाओगे
Naviii dar b dar
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ज़माने में है ये जो तनक़ीद अपनी भला कोई किस रास्ते को चुने यूँँ
Naviii dar b dar
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उन इश्क़ के भी हारों को हारा नहीं मिला हम जैसे आशिक़ों को किनारा नहीं मिला यूँँ प्यार में जो उम्र भर उम्मीद थी यही फिर भी किसी से इश्क़ दोबारा नहीं मिला
Naviii dar b dar
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वो मुझ को याद भी क्या करता होगा अब ये हर दिन जिस की यादों में गुज़रता है
Naviii dar b dar
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रास्ता ही नहीं दिल में भी जाने को कितने ही ढब किए यूँँ तुझे पाने को
Naviii dar b dar
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