सब बजा कर तालियाँ सर्कस से हँस कर घर गए देखते ही देखते साहिर अकेला रह गया
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अब के हम तर्क-ए-रसूमात कर के देखते हैं बीच वालों के बिना बात कर के देखते हैं इस सेे पहले कि कोई फ़ैसला तलवार करे आख़िरी बार मुलाक़ात कर के देखते हैं
Abrar Kashif
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तू ने देखी है वो पेशानी वो रुख़्सार वो होंठ ज़िंदगी जिन के तसव्वुर में लुटा दी हम ने तुझ पे उठी हैं वो खोई हुई साहिर आँखें तुझ को मालूम है क्यूँ उम्र गँवा दी हम ने
Faiz Ahmad Faiz
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मुरली छूटी शंख बजा रास तजा फिर युद्ध सजा क्या पीछे क्या आगे है सब कुछ राधे राधे है
Zubair Ali Tabish
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हम तो कुछ देर हँस भी लेते हैं दिल हमेशा उदास रहता है
Bashir Badr
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आख़िर को हँस पड़ेंगे किसी एक बात पर रोना तमाम उम्र का बे-कार जाएगा
Khursheed Rizvi
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जब भी उस को बोलता हूँ प्यार का इज़हार कर बोलती है सब्र कर तू सब्र कर तू सब्र कर
Kanha Mohit
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सभी को बोझ लगता है मेरा होना ज़माने में अगर मैं बोझ बन जाऊँ मेरे पँखे के ऊपर तो
Kanha Mohit
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चूम लेना लबों को मिलो गर कभी सब्र का फल मिले मुझ को भी आपसे
Kanha Mohit
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मेरी आँखों ने दिल से बात छेड़ी हुई चर्चा तुम्हारी सादगी की
Kanha Mohit
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मज़हबी बातों के पीछे भाई भाई लड़ रहे मस्जिदें तन्हा हुई मन्दिर अकेला रह गया
Kanha Mohit
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