शे'र पहले तो गुज़रते हैं अलम से बा'द उस के कुछ हुआ मेरी क़लम से
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कोई दिक़्क़त नहीं है गर तुम्हें उलझा सा लगता हूँ मैं पहली मर्तबा मिलने में सब को ऐसा लगता हूँ ज़रूरी तो नहीं हम साथ हैं तो कोई चक्कर हो वो मेरी दोस्त है और मैं उसे बस अच्छा लगता हूँ
Ali Zaryoun
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ख़ुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहले ख़ुदा बंदे से ख़ुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है
Allama Iqbal
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ये अलग बात कि ख़ामोश खड़े रहते हैं फिर भी जो लोग बड़े हैं, वो बड़े रहते हैं
Rahat Indori
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शाख़ों से टूट जाएँ वो पत्ते नहीं हैं हम आँधी से कोई कह दे कि औक़ात में रहे
Rahat Indori
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पूछते हैं वो कि ग़ालिब कौन है कोई बतलाओ कि हम बतलाएँ क्या
Mirza Ghalib
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उम्र भर हम को यही इक काम दे दो देखने को रोज़ ढलती शाम दे दो
Saurabh
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कुछ दिन बा'द तो ये भी न बोला जाएगा जो भी होगा आगे देखा जाएगा
Saurabh
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शा'इरी घूमती है इसी में फ़लसफ़ा और दिल का फ़साना
Saurabh
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जिन का भी पहनावा सादा होगा उन्हें बदन का इल्म ज़ियादा होगा
Saurabh
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मिली तो नहीं है मगर हाँ बुरी चीज़ होगी वफ़ा भी
Saurabh
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