सुतून-ए-दार पे रखते चलो सरों के चराग़ जहाँ तलक ये सितम की सियाह रात चले
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अब मैं सारे जहाँ में हूँ बदनाम अब भी तुम मुझ को जानती हो क्या
Jaun Elia
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मैं किस से पूछूँ ये रस्ता दुरुस्त है कि ग़लत जहाँ से कोई गुज़रता नहीं वहाँ हूँ मैं
Umair Najmi
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जहाँ पंखा चल रहा है वहीं रस्सी भी पड़ी है मुझे फिर ख़याल आया, अभी ज़िन्दगी पड़ी है
Zubair Ali Tabish
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जहाँ से जी न लगे तुम वहीं बिछड़ जाना मगर ख़ुदा के लिए बे-वफ़ाई न करना
Munawwar Rana
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ग़म और ख़ुशी में फ़र्क़ न महसूस हो जहाँ मैं दिल को उस मक़ाम पे लाता चला गया
Sahir Ludhianvi
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सुनते हैं कि काँटे से गुल तक हैं राह में लाखों वीराने कहता है मगर ये अज़्म-ए-जुनूँ सहरा से गुलिस्ताँ दूर नहीं
Majrooh Sultanpuri
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इस बाग़ में वो संग के क़ाबिल कहा न जाए जब तक किसी समर को मेरा दिल कहा न जाए
Majrooh Sultanpuri
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रोक सकता हमें ज़िंदान-ए-बला क्या 'मजरूह' हम तो आवाज़ हैं दीवार से छन जाते हैं
Majrooh Sultanpuri
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'मजरूह' क़ाफ़िले की मिरे दास्ताँ ये है रहबर ने मिल के लूट लिया राहज़न के साथ
Majrooh Sultanpuri
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बढ़ाई मय जो मोहब्बत से आज साक़ी ने ये काँपे हाथ कि साग़र भी हम उठा न सके
Majrooh Sultanpuri
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