sutun-e-dar pe rakhte chalo saron ke charagh jahan talak ye sitam ki siyah raat chale
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दिया जला के सभी बाम-ओ-दर में रखते हैं और एक हम हैं इसे रह-गुज़र में रखते हैं समुंदरों को भी मालूम है हमारा मिज़ाज कि हम तो पहला क़दम ही भँवर में रखते हैं
Abrar Kashif
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अगर तुम्हारी अना ही का है सवाल तो फिर चलो मैं हाथ बढ़ाता हूँ दोस्ती के लिए
Ahmad Faraz
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तेरे गले में जो बाँहों को डाल रखते हैं तुझे मनाने का कैसा कमाल रखते हैं
Wasi Shah
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चलो फिर से मिलें हम अजनबी बनकर चलो फिर से वफ़ा की क़स में हम खाएँ
ATUL SINGH
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चलो अच्छा हुआ काम आ गई दीवानगी अपनी वगरना हम ज़माने भर को समझाने कहाँ जाते
Qateel Shifai
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बहाने और भी होते जो ज़िंदगी के लिए हम एक बार तेरी आरज़ू भी खो देते
Majrooh Sultanpuri
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अब कारगह-ए-दहर में लगता है बहुत दिल ऐ दोस्त कहीं ये भी तिरा ग़म तो नहीं है
Majrooh Sultanpuri
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इस बाग़ में वो संग के क़ाबिल कहा न जाए जब तक किसी समर को मेरा दिल कहा न जाए
Majrooh Sultanpuri
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सुनते हैं कि काँटे से गुल तक हैं राह में लाखों वीराने कहता है मगर ये अज़्म-ए-जुनूँ सहरा से गुलिस्ताँ दूर नहीं
Majrooh Sultanpuri
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कुछ बता तू ही नशेमन का पता मैं तो ऐ बाद-ए-सबा भूल गया
Majrooh Sultanpuri
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