tashbih tere chehre ko kya dun gul-e-tar se hota hai shagufta magar itna nahin hota
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तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है
Faiz Ahmad Faiz
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ख़ुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहले ख़ुदा बंदे से ख़ुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है
Allama Iqbal
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ये मुझे चैन क्यूँ नहीं पड़ता एक ही शख़्स था जहान में क्या
Jaun Elia
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पूछते हैं वो कि ग़ालिब कौन है कोई बतलाओ कि हम बतलाएँ क्या
Mirza Ghalib
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मत पूछ कि क्या हाल है मेरा तेरे पीछे तू देख कि क्या रंग है तेरा, मेरे आगे
Mirza Ghalib
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क़ौम के ग़म में डिनर खाते हैं हुक्काम के साथ रंज लीडर को बहुत है मगर आराम के साथ
Akbar Allahabadi
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दिल वो है कि फ़रियाद से लबरेज़ है हर वक़्त हम वो हैं कि कुछ मुँह से निकलने नहीं देते
Akbar Allahabadi
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नाज़ क्या इस पे जो बदला है ज़माने ने तुम्हें मर्द हैं वो जो ज़माने को बदल देते हैं
Akbar Allahabadi
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रहता है इबादत में हमें मौत का खटका हम याद-ए-ख़ुदा करते हैं कर ले न ख़ुदा याद
Akbar Allahabadi
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इस क़दर था खटमलों का चारपाई में हुजूम वस्ल का दिल से मिरे अरमान रुख़्सत हो गया
Akbar Allahabadi
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