तेरी हर इक निशानी मिट चुकी है बस इक तेरा दिया रुमाल बाकी मेरा अब हाल क्या तुम पूँछतीं हो मेरा कोई नहीं जब हाल बाकी
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कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी सदियों रहा है दुश्मन दौर-ए-ज़माँ हमारा
Allama Iqbal
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ये दुख अलग है कि उस सेे मैं दूर हो रहा हूँ ये ग़म जुदा है वो ख़ुद मुझे दूर कर रहा है तेरे बिछड़ने पर लिख रहा हूँ मैं ताज़ा ग़ज़लें ये तेरा ग़म है जो मुझ को मशहूर कर रहा है
Tehzeeb Hafi
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उस की जुल्फ़ें उदास हो जाए इस-क़दर रौशनी भी ठीक नहीं तुम ने नाराज़ होना छोड़ दिया इतनी नाराज़गी भी ठीक नहीं
Fahmi Badayuni
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हम को मिटा सके ये ज़माने में दम नहीं हम से ज़माना ख़ुद है ज़माने से हम नहीं
Jigar Moradabadi
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उलझ कर के तेरी ज़ुल्फ़ों में यूँँ आबाद हो जाऊँ कि जैसे लखनऊ का मैं अमीनाबाद हो जाऊँ मैं यमुना की तरह तन्हा निहारूँ ताज को कब तक कोई गंगा मिले तो मैं इलाहाबाद हो जाऊँ
Ashraf Jahangeer
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ये जो कुछ घर तुम्हारे और मेरे बीच में हैं ना कि लज्जत इश्क़ में अपने इसी चलते नहीं आती
Aditya
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झूठ कहना मुझे नहीं आता पर चलो इज़्तिहाद करता हूँ अब तेरी याद ख़ुद नहीं आती तौर-ए-रस्मन मैं याद करता हूँ
Aditya
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अब तलक कौन मेरे जैसा मिला है मुझ को बस इसी बात का उस रब से गिला है मुझ को
Aditya
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ज़रा सी पी जो ली हम ने बपा है क्यूँ ये हंगामा दिवाने मीर-ओ-ग़ालिब के करें ना ये करें तो क्या
Aditya
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हमारे बा'द भी कल इक नए मौसम को आना है हमें उस के लिए अच्छा सा इक रस्ता बनाना है
Aditya
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