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तुम्हें यक़ीन नहीं आएगा लेकिन मैं सच कहता हूँ मैं ने उस इंसान को देखा भी है और जिया भी है

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ये शहर आम सा ही शहर है बहिश्त नहीं बस इक अज़ीज़ रहा करता था यहाँ मेरा

Mohit Dixit

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इस कहानी में कहीं नाम हमारा भी तो था उस सेे कहना कि सिकन्दर कभी हारा भी तो था

Mohit Dixit

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ज़ेहन-ओ-दिल में मेरे पेच है इक फँसी तुझ को जाना है तो जा चला जा अभी इश्क़ है तुझ सेे या है महज़ दिल-लगी तुझ को जाना है तो जा चला जा अभी ये तअल्लुक़ भी आसाँ नहीं हम-सफ़र मोड़ आने हैं आएँगे आगे मगर घर पलटने का ये मोड़ है आख़िरी तुझ को जाना है तो जा चला जा अभी

Mohit Dixit

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इसीलिए तो दिया दिल मता-ए-जान तुम्हें किसी भी आन पलट सकते थे ज़बान से हम

Mohit Dixit

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हम ने हर शय में तलाशी है कोई और ही शय और इसी धुन में हमेशा रहे खोए खोए फिर किसी और के धोखे में किसी को चाहा फिर किसी और के काँधे पे किसी को रोए

Mohit Dixit

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