टूट पड़ती थीं घटाएँ जिन की आँखें देख कर वो भरी बरसात में तरसे हैं पानी के लिए
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लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में तुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में
Bashir Badr
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अक्सर ही ज़ख़्म इश्क़ में पाले हैं औरतें पर कितने टूटे मर्द सँभाले हैं औरतें
Abhishar Geeta Shukla
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तुम ने भी उन से ही मिलना होता है जिन लोगों से मेरा झगड़ा होता है तुम मेरी दुनिया में बिल्कुल ऐसे हो ताश में जैसे हुकुम का इक्का होता है
Zia Mazkoor
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ये हिजरतों का ज़माना भी क्या ज़माना है उन्हीं से दूर हैं जिन के लिए कमाना है
Syed Sarosh Asif
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तू ने देखी है वो पेशानी वो रुख़्सार वो होंठ ज़िंदगी जिन के तसव्वुर में लुटा दी हम ने तुझ पे उठी हैं वो खोई हुई साहिर आँखें तुझ को मालूम है क्यूँ उम्र गँवा दी हम ने
Faiz Ahmad Faiz
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ज़िंदगी भर यूँँ मेरे दिल को दुखाया था बहुत क़ब्र पर आया है वो मुझ से मुआ'फ़ी के लिए
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ज़िंदगी भर मैं बोलूँगा तुझ को इश्क़ का यूँँ दग़ाबाज़ है तू
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ज़रा तुम अपनी हद में रहने की कोशिश करो वरना तुम्हारे ऐब से इक दिन तुम्हें बदनाम कर देंगे
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उस सेे कहने में जब शरम आई तब मिरे हाथों में क़लम आई ज़िन्दगी मेरे हिस्से में तू भी आई लेकिन बहुत ही कम आई
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तू कहीं मत जा छोड़ कर मुझ को क्या करूँँगा तेरे बग़ैर यहाँ
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