वो बहकर जब निकलती है हिमालय–आशियाने से उसी गंगा का होना मन–इलाहाबाद करता है
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उलझ कर के तेरी ज़ुल्फ़ों में यूँँ आबाद हो जाऊँ कि जैसे लखनऊ का मैं अमीनाबाद हो जाऊँ मैं यमुना की तरह तन्हा निहारूँ ताज को कब तक कोई गंगा मिले तो मैं इलाहाबाद हो जाऊँ
Ashraf Jahangeer
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सख़्ती थोड़ी लाज़िम है पर पत्थर होना ठीक नहीं हिन्दू मुस्लिम ठीक है साहब कट्टर होना ठीक नहीं
Salman Zafar
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उस की जुल्फ़ें उदास हो जाए इस-क़दर रौशनी भी ठीक नहीं तुम ने नाराज़ होना छोड़ दिया इतनी नाराज़गी भी ठीक नहीं
Fahmi Badayuni
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वो मेरी ज़िन्दगी का आख़िरी ग़म था उसी ने मुझ को ख़ुश रहना सिखाया है
Sapna Moolchandani
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मुझे ख़राब किया उस ने हाँ किया होगा उसी से पूछिए मुझ को ख़बर ज़ियादा नहीं
Zafar Iqbal
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उस की आँखें याद हैं मुझ को उस का चेहरा याद नहीं है
Vivek Vistar
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पिछला शे'र मुक़र्रर कर दो अगला मिसरा याद नहीं है
Vivek Vistar
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तारीख़ में कई जो हर हाल में खड़े थे सोचा कि लौट जाएँ पर देर तक लड़े थे
Vivek Vistar
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मियाँ तुम इस तरह सुन तो रहे हो पर डुबा देंगी तुम्हें विस्तार की बातें
Vivek Vistar
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है मुझे मालूम तेरा दिल जलाता हूँ फिर भी बुझ सके न आग दिल की सो हवा देता हूँ मैं
Vivek Vistar
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