ये जो अवाम है इस को तू ना-तवाँ न समझ इसी अवाम ने इक सल्तनत ढहा डाली
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इसी से जान गया मैं कि बख़्त ढलने लगे मैं थक के छाँव में बैठा तो पेड़ चलने लगे मैं दे रहा था सहारे तो इक हुजूम में था जो गिर पड़ा तो सभी रास्ता बदलने लगे
Farhat Abbas Shah
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उसे समझने का कोई तो रास्ता निकले मैं चाहता भी यही था वो बे-वफ़ा निकले
Waseem Barelvi
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है राम के वजूद पे हिन्दोस्ताँ को नाज़ अहल-ए-नज़र समझते हैं उस को इमाम-ए-हिंद
Allama Iqbal
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मेरी दुनिया उजड़ गई इस में तुम इसे हादसा समझते हो आख़िरी रास्ता तो बाक़ी है आख़िरी रास्ता समझते हो
Himanshi babra KATIB
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यूँँ तो रुस्वाई ज़हर है लेकिन इश्क़ में जान इसी से पड़ती है
Fahmi Badayuni
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ज़रूरत क्या तिजारत-गार को ख़ुद हाथ रँगने की ठिकाने कुछ लगाना हो अगर सरकार बैठी है
Mohit Subran
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ज़रा से शक पे हुआ ख़त्म राब्ता लेकिन ज़रा सा शक न हुआ ख़त्म दरमियाँ से मगर
Mohit Subran
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यक़ीं ईमाँ वफ़ादारी की बातें तू न कर मुझ से तिरी ही वज्ह से खाए हैं जितने धोके खाए हैं
Mohit Subran
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यही है आरज़ू अब तो कि इस चलती कहानी में मिरा किरदार मर जाए कहानी ख़त्म हो जाए
Mohit Subran
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यक-ब-यक उट्ठा ज़ेहन से पर्दा और सब कुछ दिखाई देने लगा
Mohit Subran
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