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ज़ख़्म तुझ को नवाज़ दूँ भी गर पर न धोखा मैं दिलरुबा दूँगा

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कोई दिक़्क़त नहीं है गर तुम्हें उलझा सा लगता हूँ मैं पहली मर्तबा मिलने में सब को ऐसा लगता हूँ ज़रूरी तो नहीं हम साथ हैं तो कोई चक्कर हो वो मेरी दोस्त है और मैं उसे बस अच्छा लगता हूँ

Ali Zaryoun

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ये दुख अलग है कि उस सेे मैं दूर हो रहा हूँ ये ग़म जुदा है वो ख़ुद मुझे दूर कर रहा है तेरे बिछड़ने पर लिख रहा हूँ मैं ताज़ा ग़ज़लें ये तेरा ग़म है जो मुझ को मशहूर कर रहा है

Tehzeeb Hafi

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उसे किसी से मोहब्बत थी और वो मैं नहीं था ये बात मुझ सेे ज़ियादा उसे रुलाती थी

Ali Zaryoun

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मेरे आँसू नहीं थम रहे कि वो मुझ सेे जुदा हो गया और तुम कह रहे हो कि छोड़ो अब ऐसा भी क्या हो गया मय-कदों में मेरी लाइनें पढ़ते फिरते हैं लोग मैं ने जो कुछ भी पी कर कहा फ़लसफ़ा हो गया

Tehzeeb Hafi

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बिछड़ गए तो ये दिल उम्र भर लगेगा नहीं लगेगा लगने लगा है मगर लगेगा नहीं नहीं लगेगा उसे देख कर मगर ख़ुश है मैं ख़ुश नहीं हूँ मगर देख कर लगेगा नहीं

Umair Najmi

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लिखी थी जो तुम्हें बेनाम सी वो चिट्ठियाँ हैं कहीं थोड़ी शिकायत है कहीं कुछ अर्ज़ियाँ हैं तुम्हारे बा'द दिल में याद ठहरी और घर में जले फ़िल्टर रखे हैं और थोड़ी तीलियाँ हैं

Shan Sharma

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मुझे अच्छा नहीं लगता ये कहना हमनवाई में हुआ पर है बहुत नुक़सान तुझ सेे आशनाई में दिया है वक़्त जितना इक तिरी इस चाह को मैं ने ख़ुदा मिल जाता है इतने दिनों की पारसाई में

Shan Sharma

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हमारे दरमियाँ जो है गवारा हो नहीं सकता यही मैं तुम रहा तो कुछ हमारा हो नहीं सकता मुझे तो इश्क़ लगता है ख़ुदा का मो'जिज़ा कोई मिरा जिस्मों की चाहत से गुज़ारा हो नहीं सकता

Shan Sharma

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मना करते उसे थे जो वही वो कर दिखाती थी मैं सूरज को उगाता था वो रातें खींच लाती थी अभी भी तुम में ज़िंदा है वही बेबाक़ सी लड़की ज़माने के उसूलों पे जो खुल के मुस्कुराती थी

Shan Sharma

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किताबें शौक़ से पढ़ने लगी तुम मैं भी थोड़ा बहुत लिखने लगा हूँ

Shan Sharma

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