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आबाद रहेंगे वीराने शादाब रहेंगी ज़ंजीरें जब तक दीवाने ज़िंदा हैं फूलेंगी फलेंगी ज़ंजीरें आज़ादी का दरवाज़ा भी ख़ुद ही खोलेंगी ज़ंजीरें टुकड़े टुकड़े हो जाएँगी जब हद से बढ़ेंगी ज़ंजीरें जब सब के लब सिल जाएँगे हाथों से क़लम छिन जाएँगे बातिल से लोहा लेने का एलान करेंगी ज़ंजीरें अंधों बहरों की नगरी में यूँँ कौन तवज्जोह करता है माहौल सुनेगा देखेगा जिस वक़्त बजेंगी ज़ंजीरें जो ज़ंजीरों से बाहर हैं आज़ाद उन्हें भी मत समझो जब हाथ कटेंगे ज़ालिम के उस वक़्त कटेंगी ज़ंजीरें ज़ंजीरें तो कट जाएँगी हाँ उन के निशाँ रह जाएँगे मेरा क्या है ज़ालिम तुझ को बदनाम करेंगी ज़ंजीरें ये दौर भी हैं सय्यादी के ये ढंग भी हैं जल्लादी के सिमटेगी सिकुड़ेंगी ज़ंजीरें फैलेंगी फलेंगी ज़ंजीरें ले दे के 'हफ़ीज़' उन सेे ही थी उम्मीद-ए-वफ़ा दीवानों को क्या होगा जब दीवानों से नाता तोड़ेंगी ज़ंजीरें

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सारे का सारा तो मेरा भी नहीं और वो शख़्स बे-वफ़ा भी नहीं ग़ौर से देखने पे बोली है शादी से पहले सोचना भी नहीं अच्छी सेहत का है मेरा महबूब धोखे देते हुए थका भी नहीं जितना बर्बाद कर दिया तू ने उतना आबाद तो मैं था भी नहीं मुझ को बस इतना दीन आता है जहाँ मैं ख़ुद नहीं ख़ुदा भी नहीं

Kushal Dauneria

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तूफ़ान की उम्मीद थी आँधी नहीं आई वो आप तो क्या उस की ख़बर भी नहीं आई कुछ आँखों में तो हो गया आबाद वो चेहरा कुछ बस्तियों में आज भी बिजली नहीं आई हर रोज़ पलट आते थे मेहमान किसी के हर रोज़ ये कहते थे कि गाड़ी नहीं आई वो आग बुझी तो हमें मौसम ने झिंझोड़ा वर्ना यही लगता था कि सर्दी नहीं आई शायद वो मोहब्बत के लिए ठीक नहीं था शायद ये अँगूठी उसे पूरी नहीं आई

Khurram Afaq

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तन्हा तन्हा दुख झेलेंगे महफ़िल महफ़िल गाएँगे जब तक आँसू पास रहेंगे तब तक गीत सुनाएँगे तुम जो सोचो वो तुम जानो हम तो अपनी कहते हैं देर न करना घर आने में वर्ना घर खो जाएँगे बच्चों के छोटे हाथों को चाँद सितारे छूने दो चार किताबें पढ़ कर ये भी हम जैसे हो जाएँगे अच्छी सूरत वाले सारे पत्थर-दिल हों मुमकिन है हम तो उस दिन राय देंगे जिस दिन धोका खाएँगे किन राहों से सफ़र है आसाँ कौन सा रस्ता मुश्किल है हम भी जब थक कर बैठेंगे औरों को समझाएँगे

Nida Fazli

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फिरते हैं कब से दर-ब-दर अब इस नगर अब उस नगर इक दूसरे के हम-सफ़र मैं और मिरी आवारगी ना-आश्ना हर रह-गुज़र ना-मेहरबाँ हर इक नज़र जाएँ तो अब जाएँ किधर मैं और मिरी आवारगी हम भी कभी आबाद थे ऐसे कहाँ बर्बाद थे बे-फ़िक्र थे आज़ाद थे मसरूर थे दिल-शाद थे वो चाल ऐसी चल गया हम बुझ गए दिल जल गया निकले जला के अपना घर मैं और मिरी आवारगी जीना बहुत आसान था इक शख़्स का एहसान था हम को भी इक अरमान था जो ख़्वाब का सामान था अब ख़्वाब है नय आरज़ू अरमान है नय जुस्तुजू यूँँ भी चलो ख़ुश हैं मगर मैं और मिरी आवारगी वो माह-वश वो माह-रू वो माह-काम-ए-हू-ब-हू थीं जिस की बातें कू-ब-कू उस से अजब थी गुफ़्तुगू फिर यूँँ हुआ वो खो गई तो मुझ को ज़िद सी हो गई लाएँगे उस को ढूँड कर मैं और मिरी आवारगी ये दिल ही था जो सह गया वो बात ऐसी कह गया कहने को फिर क्या रह गया अश्कों का दरिया बह गया जब कह के वो दिलबर गया तेरे लिए मैं मर गया रोते हैं उस को रात भर मैं और मिरी आवारगी अब ग़म उठाएँ किस लिए आँसू बहाएँ किस लिए ये दिल जलाएँ किस लिए यूँँ जाँ गंवाएँ किस लिए पेशा न हो जिस का सितम ढूँडेंगे अब ऐसा सनम होंगे कहीं तो कार-गर मैं और मिरी आवारगी आसार हैं सब खोट के इम्कान हैं सब चोट के घर बंद हैं सब गोट के अब ख़त्म हैं सब टोटके क़िस्मत का सब ये फेर है अंधेर है अंधेर है ऐसे हुए हैं बे-असर मैं और मिरी आवारगी जब हमदम-ओ-हमराज़ था तब और ही अंदाज़ था अब सोज़ है तब साज़ था अब शर्म है तब नाज़ था अब मुझ से हो तो हो भी क्या है साथ वो तो वो भी क्या इक बे-हुनर इक बे-समर मैं और मिरी आवारगी

Javed Akhtar

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भड़का रहे हैं आग लब-ए-नग़्मागर से हम ख़ामोश क्या रहेंगे ज़माने के डर से हम कुछ और बढ़ गए जो अँधेरे तो क्या हुआ मायूस तो नहीं हैं तुलू-ए-सहरस हम ले दे के अपने पास फ़क़त इक नज़र तो है क्यूँँ देखें ज़िंदगी को किसी की नज़र से हम माना कि इस ज़मीं को न गुलज़ार कर सके कुछ ख़ार कम तो कर गए गुज़रे जिधर से हम

Sahir Ludhianvi

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