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aghhosh-e-sitam men hi chhupa le koi aa kar tanha to tadapne se bacha le koi aa kar sahra men uga huun ki miri chhanv koi paae hilta huun ki patton ki hava le koi aa kar bikta to nahin huun na mire daam bahut hain raste men pada huun ki utha le koi aa kar kashti huun mujhe koi kinare se to khole tufan ke hi kar jaae havale koi aa kar jab khinch liya hai mujhe maidan-e-sitam men dil khol ke hasrat bhi nikale koi aa kar do chaar kharashon se ho taskin-e-jafa kya shisha huun to patthar pe uchhale koi aa kar mere kisi ehsan ka badla na chukae apni hi vafaon ka sila le koi aa kar aaghosh-e-sitam mein hi chhupa le koi aa kar tanha to tadapne se bacha le koi aa kar sahra mein uga hun ki meri chhanw koi pae hilta hun ki patton ki hawa le koi aa kar bikta to nahin hun na mere dam bahut hain raste mein pada hun ki utha le koi aa kar kashti hun mujhe koi kinare se to khole tufan ke hi kar jae hawale koi aa kar jab khinch liya hai mujhe maidan-e-sitam mein dil khol ke hasrat bhi nikale koi aa kar do chaar kharashon se ho taskin-e-jafa kya shisha hun to patthar pe uchhaale koi aa kar mere kisi ehsan ka badla na chukae apni hi wafaon ka sila le koi aa kar

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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को

Naseer Turabi

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ख़ामोश लब हैं झुकी हैं पलकें, दिलों में उल्फ़त नई नई है अभी तक़ल्लुफ़ है गुफ़्तगू में, अभी मोहब्बत नई नई है अभी न आएँगी नींद तुम को, अभी न हम को सुकूँ मिलेगा अभी तो धड़केगा दिल ज़ियादा, अभी मुहब्बत नई नई है बहार का आज पहला दिन है, चलो चमन में टहल के आएँ फ़ज़ा में ख़ुशबू नई नई है गुलों में रंगत नई नई है जो ख़ानदानी रईस हैं वो मिज़ाज रखते हैं नर्म अपना तुम्हारा लहजा बता रहा है, तुम्हारी दौलत नई नई है ज़रा सा क़ुदरत ने क्या नवाज़ा के आके बैठे हो पहली सफ़ में अभी क्यूँ उड़ने लगे हवा में अभी तो शोहरत नई नई है बमों की बरसात हो रही है, पुराने जांबाज़ सो रहे हैं ग़ुलाम दुनिया को कर रहा है वो जिस की ताक़त नई नई है

Shabeena Adeeb

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कैसे उस ने ये सब कुछ मुझ सेे छुप कर बदला चेहरा बदला रस्ता बदला बा'द में घर बदला मैं उस के बारे में ये कहता था लोगों से मेरा नाम बदल देना वो शख़्स अगर बदला वो भी ख़ुश था उस ने दिल देकर दिल माँगा है मैं भी ख़ुश हूँ मैं ने पत्थर से पत्थर बदला मैं ने कहा क्या मेरी ख़ातिर ख़ुद को बदलोगे और फिर उस ने नज़रें बदलीं और नंबर बदला

Tehzeeb Hafi

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यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले

Anand Raj Singh

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अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें ढूँढ़ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो नशा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें तू ख़ुदा है न मिरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा दोनों इंसाँ हैं तो क्यूँँ इतने हिजाबों में मिलें आज हम दार पे खींचे गए जिन बातों पर क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें अब न वो मैं न वो तू है न वो माज़ी है 'फ़राज़' जैसे दो शख़्स तमन्ना के सराबों में मिलें

Ahmad Faraz

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किसी झूटी वफ़ा से दिल को बहलाना नहीं आता मुझे घर काग़ज़ी फूलों से महकाना नहीं आता मैं जो कुछ हूँ वही कुछ हूँ जो ज़ाहिर है वो बातिन है मुझे झूटे दर-ओ-दीवार चमकाना नहीं आता मैं दरिया हूँ मगर बहता हूँ मैं कोहसार की जानिब मुझे दुनिया की पस्ती में उतर जाना नहीं आता ज़र-ओ-माल-ओ-जवाहर ले भी और ठुकरा भी सकता हूँ कोई दिल पेश करता हो तो ठुकराना नहीं आता परिंदा जानिब-ए-दाना हमेशा उड़ के आता है परिंदे की तरफ़ उड़ कर कभी दाना नहीं आता अगर सहरा में हैं तो आप ख़ुद आए हैं सहरा में किसी के घर तो चल कर कोई वीराना नहीं आता हुआ है जो सदा उस को नसीबों का लिखा समझा 'अदीम' अपने किए पर मुझ को पछताना नहीं आता

Adeem Hashmi

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तेरे लिए चले थे हम तेरे लिए ठहर गए तू ने कहा तो जी उठे तू ने कहा तो मर गए कट ही गई जुदाई भी कब ये हुआ कि मर गए तेरे भी दिन गुज़र गए मेरे भी दिन गुज़र गए तू भी कुछ और और है हम भी कुछ और और हैं जाने वो तू किधर गया जाने वो हम किधर गए राहों में ही मिले थे हम राहें नसीब बन गईं वो भी न अपने घर गया हम भी न अपने घर गए वक़्त ही जुदाई का इतना तवील हो गया दिल में तिरे विसाल के जितने थे ज़ख़्म भर गए होता रहा मुक़ाबला पानी का और प्यास का सहरा उमड उमड पड़े दरिया बिफर बिफर गए वो भी ग़ुबार-ए-ख़्वाब था हम भी ग़ुबार-ए-ख़्वाब थे वो भी कहीं बिखर गया हम भी कहीं बिखर गए कोई कनार-ए-आबजू बैठा हुआ है सर-निगूँ कश्ती किधर चली गई जाने किधर भँवर गए आज भी इंतिज़ार का वक़्त हुनूत हो गया ऐसा लगा कि हश्र तक सारे ही पल ठहर गए बारिश-ए-वस्ल वो हुई सारा ग़ुबार धुल गया वो भी निखर निखर गया हम भी निखर निखर गए आब-ए-मुहीत-ए-इश्क़ का बहर अजीब बहर है तैरे तो ग़र्क़ हो गए डूबे तो पार कर गए इतने क़रीब हो गए अपने रक़ीब हो गए वो भी 'अदीम' डर गया हम भी 'अदीम' डर गए उस के सुलूक पर 'अदीम' अपनी हयात-ओ-मौत है वो जो मिला तो जी उठे वो न मिला तो मर गए

Adeem Hashmi

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