आहट सी कोई आए तो लगता है कि तुम हो साया कोई लहराए तो लगता है कि तुम हो जब शाख़ कोई हाथ लगाते ही चमन में शरमाए लचक जाए तो लगता है कि तुम हो संदल से महकती हुई पुर-कैफ़ हवा का झोंका कोई टकराए तो लगता है कि तुम हो ओढ़े हुए तारों की चमकती हुई चादर नद्दी कोई बल खाए तो लगता है कि तुम हो जब रात गए कोई किरन मेरे बराबर चुप-चाप सी सो जाए तो लगता है कि तुम हो
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मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता
Tehzeeb Hafi
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कभी मिलेंगे तो ये कर्ज़ भी उतारेंगे तुम्हारे चेहरे को पहरों तलक निहारेंगे ये क्या सितम कि खिलाड़ी बदल दिया उस ने हम इस उमीद पे बैठे थे हम ही हारेंगे हमारे बा'द तेरे इश्क़ में नए लड़के बदन तो चू मेंगे ज़ुल्फ़ें नहीं सँवारेंगे
Vikram Gaur Vairagi
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ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो
Jaun Elia
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क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा
Javed Akhtar
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तुम हक़ीक़त नहीं हो हसरत हो जो मिले ख़्वाब में वो दौलत हो तुम हो ख़ुशबू के ख़्वाब की ख़ुशबू और इतने ही बेमुरव्वत हो किस तरह छोड़ दूँ तुम्हें जानाँ तुम मेरी ज़िन्दगी की आदत हो किसलिए देखते हो आईना तुम तो ख़ुद से भी ख़ूब-सूरत हो दास्ताँ ख़त्म होने वाली है तुम मेरी आख़िरी मुहब्बत हो
Jaun Elia
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तमाम उम्र अज़ाबों का सिलसिला तो रहा ये कम नहीं हमें जीने का हौसला तो रहा गुज़र ही आए किसी तरह तेरे दीवाने क़दम क़दम पे कोई सख़्त मरहला तो रहा चलो न इश्क़ ही जीता न अक़्ल हार सकी तमाम वक़्त मज़े का मुक़ाबला तो रहा मैं तेरी ज़ात में गुम हो सका न तू मुझ में बहुत क़रीब थे हम फिर भी फ़ासला तो रहा ये और बात कि हर छेड़ ला-उबाली थी तिरी नज़र का दिलों से मोआ'मला तो रहा
Jaan Nisar Akhtar
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हर एक रूह में इक ग़म छुपा लगे है मुझे ये ज़िंदगी तो कोई बद-दुआ लगे है मुझे पसंद-ए-ख़ातिर-ए-अहल-ए-वफ़ा है मुद्दत से ये दिल का दाग़ जो ख़ुद भी भला लगे है मुझे जो आँसुओं में कभी रात भीग जाती है बहुत क़रीब वो आवाज़-ए-पा लगे है मुझे मैं सो भी जाऊँ तो क्या मेरी बंद आँखों में तमाम रात कोई झाँकता लगे है मुझे मैं जब भी उस के ख़यालों में खो सा जाता हूँ वो ख़ुद भी बात करे तो बुरा लगे है मुझे मैं सोचता था कि लौटूँगा अजनबी की तरह ये मेरा गाँव तो पहचानता लगे है मुझे न जाने वक़्त की रफ़्तार क्या दिखाती है कभी कभी तो बड़ा ख़ौफ़ सा लगे है मुझे बिखर गया है कुछ इस तरह आदमी का वजूद हर एक फ़र्द कोई सानेहा लगे है मुझे अब एक आध क़दम का हिसाब क्या रखिए अभी तलक तो वही फ़ासला लगे है मुझे हिकायत-ए-ग़म-ए-दिल कुछ कशिश तो रखती है ज़माना ग़ौर से सुनता हुआ लगे है मुझे
Jaan Nisar Akhtar
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एक तो नैनाँ कजरारे और तिस पर डूबे काजल में बिजली की बढ़ जाए चमक कुछ और भी गहरे बादल में आज ज़रा ललचाई नज़र से उस को बस क्या देख लिया पग-पग उस के दिल की धड़कन उतरी आए पायल में प्यासे प्यासे नैनाँ उस के जाने पगली चाहे क्या तट पर जब भी जावे सोचे नदिया भर लूँ छागल में सुब्ह नहाने जूड़ा खोले नाग बदन से आ लिपटें उस की रंगत उस की ख़ुश्बू कितनी मिलती संदल में गोरी इस संसार में मुझ को ऐसा तेरा रूप लगे जैसे कोई दीप जला हो घोर अँधेरे जंगल में प्यार की यूँँ हर बूँद जला दी मैं ने अपने सीने में जैसे कोई जलती माचिस डाल दे पी कर बोतल में आज पता क्या कौन से लम्हे कौन सा तूफ़ाँ जाग उठे जाने कितनी दर्द की सदियाँ गूँज रही हैं पल पल में
Jaan Nisar Akhtar
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ज़रा सी बात पे हर रस्म तोड़ आया था दिल-ए-तबाह ने भी क्या मिज़ाज पाया था गुज़र गया है कोई लम्हा-ए-शरर की तरह अभी तो मैं उसे पहचान भी न पाया था मुआ'फ़ कर न सकी मेरी ज़िंदगी मुझ को वो एक लम्हा कि मैं तुझ से तंग आया था शगुफ़्ता फूल सिमट कर कली बने जैसे कुछ इस कमाल से तू ने बदन चुराया था पता नहीं कि मिरे बा'द उन पे क्या गुज़री मैं चंद ख़्वाब ज़माने में छोड़ आया था
Jaan Nisar Akhtar
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अच्छा है उन सेे कोई तक़ाज़ा किया न जाए अपनी नज़र में आप को रुस्वा किया न जाए हम हैं तिरा ख़याल है तेरा जमाल है इक पल भी अपने आप को तन्हा किया न जाए उठने को उठ तो जाएँ तिरी अंजुमन से हम पर तेरी अंजुमन को भी सूना किया न जाए उन की रविश जुदा है हमारी रविश जुदा हम से तो बात बात पे झगड़ा किया न जाए हर-चंद ए'तिबार में धोके भी हैं मगर ये तो नहीं किसी पे भरोसा किया न जाए लहजा बना के बात करें उन के सामने हम से तो इस तरह का तमाशा किया न जाए इनआ'म हो ख़िताब हो वैसे मिले कहाँ जब तक सिफ़ारिशों को इकट्ठा किया न जाए इस वक़्त हम से पूछ न ग़म रोज़गार के हम से हर एक घूँट को कड़वा किया न जाए
Jaan Nisar Akhtar
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