हर-चंद ए'तिबार में धोके भी हैं मगर ये तो नहीं किसी पे भरोसा किया न जाए
Writer
Jaan Nisar Akhtar
@jaan-nisar-akhtar
1
Sher
7
Ghazal
10
Nazm
और क्या इस से ज़ियादा कोई नर्मी बरतूँ दिल के ज़ख़्मों को छुआ है तिरे गालों की तरह
लोग कहते हैं कि तू अब भी ख़फ़ा है मुझ से तेरी आँखों ने तो कुछ और कहा है मुझ से
लोग कहते हैं कि तू अब भी ख़फ़ा है मुझ से तेरी आँखों ने तो कुछ और कहा है मुझ से
सौ चाँद भी चमकेंगे तो क्या बात बनेगी तुम आए तो इस रात की औक़ात बनेगी
अश'आर मिरे यूँँ तो ज़माने के लिए हैं कुछ शे'र फ़क़त उन को सुनाने के लिए हैं
अब ये भी नहीं ठीक कि हर दर्द मिटा दें कुछ दर्द कलेजे से लगाने के लिए हैं
आहट सी कोई आए तो लगता है कि तुम हो साया कोई लहराए तो लगता है कि तुम हो
साँस लेती हूँ तो यूँँ महसूस होता है मुझे जैसे मेरे दिल की हर धड़कन में शामिल आप हैं
ये इल्म का सौदा ये रिसाले ये किताबें इक शख़्स की यादों को भुलाने के लिए हैं
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