आज सड़कों पर लिखे हैं सैकड़ों नारे न देख पर अँधेरा देख तू आकाश के तारे न देख एक दरिया है यहाँ पर दूर तक फैला हुआ आज अपने बाज़ुओं को देख पतवारें न देख अब यक़ीनन ठोस है धरती हक़ीक़त की तरह ये हक़ीक़त देख लेकिन ख़ौफ़ के मारे न देख वे सहारे भी नहीं अब जंग लड़नी है तुझे कट चुके जो हाथ उन हाथों में तलवारें न देख ये धुँधलका है नज़र का तू महज़ मायूस है रौज़नों को देख दीवारों में दीवारें न देख राख़ कितनी राख़ है, चारों तरफ़ बिख़री हुई राख़ में चिंगारियाँ ही देख अंगारे न देख
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उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे
Tehzeeb Hafi
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यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले
Anand Raj Singh
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क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा
Javed Akhtar
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तुम हक़ीक़त नहीं हो हसरत हो जो मिले ख़्वाब में वो दौलत हो तुम हो ख़ुशबू के ख़्वाब की ख़ुशबू और इतने ही बेमुरव्वत हो किस तरह छोड़ दूँ तुम्हें जानाँ तुम मेरी ज़िन्दगी की आदत हो किसलिए देखते हो आईना तुम तो ख़ुद से भी ख़ूब-सूरत हो दास्ताँ ख़त्म होने वाली है तुम मेरी आख़िरी मुहब्बत हो
Jaun Elia
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तेरी मुश्किल न बढ़ाऊँगा चला जाऊँगा अश्क आँखों में छुपाऊँगा चला जाऊँगा अपनी दहलीज़ पे कुछ देर पड़ा रहने दे जैसे ही होश में आऊँगा चला जाऊँगा ख़्वाब लेने कोई आए कि न आए कोई मैं तो आवाज़ लगाऊँगा चला जाऊँगा चंद यादें मुझे बच्चों की तरह प्यारी हैं उन को सीने से लगाऊँगा चला जाऊँगा मुद्दतों बा'द मैं आया हूँ पुराने घर में ख़ुद को जी भर के रुलाऊँगा चला जाऊँगा इस जज़ीरे में ज़ियादा नहीं रहना अब तो आजकल नाव बनाऊँगा चला जाऊँगा मौसम-ए-गुल की तरह लौट के आऊँगा 'हसन' हर तरफ़ फूल खिलाऊँगा चला जाऊँगा
Hasan Abbasi
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वो आदमी नहीं है मुकम्मल बयान है माथे पे उस के चोट का गहरा निशान है वो कर रहे हैं इश्क़ पे संजीदा गुफ़्तुगू मैं क्या बताऊँ मेरा कहीं और ध्यान है सामान कुछ नहीं है फटे-हाल है मगर झोले में उस के पास कोई संविधान है उस सर-फिरे को यूँँ नहीं बहला सकेंगे आप वो आदमी नया है मगर सावधान है फिस्ले जो उस जगह तो लुढ़कते चले गए हम को पता नहीं था कि इतनी ढलान है देखे हैं हम ने दौर कई अब ख़बर नहीं पावँ तले ज़मीन है या आसमान है वो आदमी मिला था मुझे उस की बात से ऐसा लगा कि वो भी बहुत बे-ज़बान है
Dushyant Kumar
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जाने किस किस का ख़याल आया है इस समुंदर में उबाल आया है एक बच्चा था हवा का झोंका साफ़ पानी को खँगाल आया है एक ढेला तो वहीं अटका था एक तू और उछाल आया है कल तो निकला था बहुत सज-धज के आज लौटा तो निढाल आया है ये नज़र है कि कोई मौसम है ये सबा है कि वबाल आया है हम ने सोचा था जवाब आएगा एक बेहूदा सवाल आया है
Dushyant Kumar
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ये शफ़क़ शाम हो रही है अब और हर गाम हो रही है अब जिस तबाही से लोग बचते थे वो सर-ए-आम हो रही है अब अज़मत-ए-मुल्क इस सियासत के हाथ नीलाम हो रही है अब शब ग़नीमत थी लोग कहते हैं सुब्ह बदनाम हो रही है अब जो किरन थी किसी दरीचे की मरक़ज-ए-बाम हो रही है अब तिश्ना-लब तेरी फुसफुसाहट भी एक पैग़ाम हो रही है अब
Dushyant Kumar
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एक गुड़िया की कई कठ-पुतलियों में जान है आज शाइ'र ये तमाशा देख कर हैरान है ख़ास सड़कें बंद हैं तब से मरम्मत के लिए ये हमारे वक़्त की सब से सही पहचान है एक बूढ़ा आदमी है मुल्क में या यूँँ कहो इस अँधेरी कोठरी में एक रौशन-दान है मस्लहत-आमेज़ होते हैं सियासत के क़दम तू न समझेगा सियासत तू अभी नादान है कल नुमाइश में मिला वो चीथड़े पहने हुए मैं ने पूछा नाम तो बोला कि हिंदुस्तान है
Dushyant Kumar
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कहाँ तो तय था चराग़ाँ हर एक घर के लिए कहाँ चराग़ मुयस्सर नहीं शहर के लिए यहाँ दरख़्तों के साए में धूप लगती है चलें यहाँ से चलें और उम्र भर के लिए न हो क़मीज़ तो पाँव से पेट ढक लेंगे ये लोग कितने मुनासिब हैं इस सफ़र के लिए ख़ुदा नहीं न सही आदमी का ख़्वाब सही कोई हसीन नज़ारा तो है नज़र के लिए वो मुतमइन हैं कि पत्थर पिघल नहीं सकता मैं बे-क़रार हूँ आवाज़ में असर के लिए जिएँ तो अपने बग़ैचा में गुलमुहर के तले मरें तो ग़ैर की गलियों में गुलमुहर के लिए
Dushyant Kumar
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