ghazalKuch Alfaaz

आँखों के लिए जश्न का पैग़ाम तो आया ताख़ीर से ही चाँद लब-ए-बाम तो आया उस बाग़ में इक फूल खिला मेरे लिए भी ख़ुशबू की कहानी में मेरा नाम तो आया पतझड़ का ज़माना था तो ये बख़्त हमारा सैर-ए-चमन-ए-दिल को वो गुलफ़ाम तो आया उड़ जाएगा फिर अपनी हवाओं में तो क्या ग़म वो ताइर-ए-ख़ुश-रंग तह-ए-दाम तो आया हर चंद कि कम अरसा-ए-ज़ेबाई में ठहरा हर चेहरा-ए-गुल बाग़ के कुछ काम तो आया शब से भी गुज़र जाएँगे गर तेरी रज़ा हो दौरान-ए-सफ़र मरहला-ए-शाम तो आया

Related Ghazal

क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा

Javed Akhtar

371 likes

तुम हक़ीक़त नहीं हो हसरत हो जो मिले ख़्वाब में वो दौलत हो तुम हो ख़ुशबू के ख़्वाब की ख़ुशबू और इतने ही बेमुरव्वत हो किस तरह छोड़ दूँ तुम्हें जानाँ तुम मेरी ज़िन्दगी की आदत हो किसलिए देखते हो आईना तुम तो ख़ुद से भी ख़ूब-सूरत हो दास्ताँ ख़त्म होने वाली है तुम मेरी आख़िरी मुहब्बत हो

Jaun Elia

315 likes

उसूलों पर जहाँ आँच आए टकराना ज़रूरी है जो ज़िंदा हो तो फिर ज़िंदा नज़र आना ज़रूरी है नई 'उम्रों की ख़ुदमुख़्तारियों को कौन समझाये कहाँ से बच के चलना है कहाँ जाना ज़रूरी है थके हारे परिंदे जब बसेरे के लिए लौटें सलीक़ामन्द शाख़ों का लचक जाना ज़रूरी है बहुत बेबाक आँखों में तअल्लुक़ टिक नहीं पाता मुहब्बत में कशिश रखने को शर्माना ज़रूरी है सलीक़ा ही नहीं शायद उसे महसूस करने का जो कहता है ख़ुदा है तो नज़र आना ज़रूरी है मेरे होंठों पे अपनी प्यास रख दो और फिर सोचो कि इस के बा'द भी दुनिया में कुछ पाना ज़रूरी है

Waseem Barelvi

107 likes

किया बादलों में सफ़र ज़िंदगी भर ज़मीं पर बनाया न घर ज़िंदगी भर सभी ज़िंदगी के मज़े लूटते हैं न आया हमें ये हुनर ज़िंदगी भर मोहब्बत रही चार दिन ज़िंदगी में रहा चार दिन का असर ज़िंदगी भर

Anwar Shaoor

95 likes

तेरी मुश्किल न बढ़ाऊँगा चला जाऊँगा अश्क आँखों में छुपाऊँगा चला जाऊँगा अपनी दहलीज़ पे कुछ देर पड़ा रहने दे जैसे ही होश में आऊँगा चला जाऊँगा ख़्वाब लेने कोई आए कि न आए कोई मैं तो आवाज़ लगाऊँगा चला जाऊँगा चंद यादें मुझे बच्चों की तरह प्यारी हैं उन को सीने से लगाऊँगा चला जाऊँगा मुद्दतों बा'द मैं आया हूँ पुराने घर में ख़ुद को जी भर के रुलाऊँगा चला जाऊँगा इस जज़ीरे में ज़ियादा नहीं रहना अब तो आजकल नाव बनाऊँगा चला जाऊँगा मौसम-ए-गुल की तरह लौट के आऊँगा 'हसन' हर तरफ़ फूल खिलाऊँगा चला जाऊँगा

Hasan Abbasi

235 likes

More from Parveen Shakir

बजा कि आँख में नींदों के सिलसिले भी नहीं शिकस्त-ए-ख़्वाब के अब मुझ में हौसले भी नहीं नहीं नहीं ये ख़बर दुश्मनों ने दी होगी वो आए आ के चले भी गए मिले भी नहीं ये कौन लोग अँधेरों की बात करते हैं अभी तो चाँद तिरी याद के ढले भी नहीं अभी से मेरे रफ़ूगर के हाथ थकने लगे अभी तो चाक मिरे ज़ख़्म के सिले भी नहीं ख़फ़ा अगरचे हमेशा हुए मगर अब के वो बरहमी है कि हम से उन्हें गिले भी नहीं

Parveen Shakir

7 likes

अपनी रुस्वाई तिरे नाम का चर्चा देखूँ इक ज़रा शे'र कहूँ और मैं क्या क्या देखूँ नींद आ जाए तो क्या महफ़िलें बरपा देखूँ आँख खुल जाए तो तन्हाई का सहरा देखूँ शाम भी हो गई धुँदला गईं आँखें भी मिरी भूलने वाले मैं कब तक तिरा रस्ता देखूँ एक इक कर के मुझे छोड़ गईं सब सखियाँ आज मैं ख़ुद को तिरी याद में तन्हा देखूँ काश संदल से मिरी माँग उजाले आ कर इतने ग़ैरों में वही हाथ जो अपना देखूँ तू मिरा कुछ नहीं लगता है मगर जान-ए-हयात जाने क्यूँँ तेरे लिए दिल को धड़कना देखूँ बंद कर के मिरी आँखें वो शरारत से हँसे बूझे जाने का मैं हर रोज़ तमाशा देखूँ सब ज़िदें उस की मैं पूरी करूँँ हर बात सुनूँ एक बच्चे की तरह से उसे हँसता देखूँ मुझ पे छा जाए वो बरसात की ख़ुश्बू की तरह अंग अंग अपना इसी रुत में महकता देखूँ फूल की तरह मिरे जिस्म का हर लब खुल जाए पंखुड़ी पंखुड़ी उन होंटों का साया देखूँ मैं ने जिस लम्हे को पूजा है उसे बस इक बार ख़्वाब बन कर तिरी आँखों में उतरता देखूँ तू मिरी तरह से यकता है मगर मेरे हबीब जी में आता है कोई और भी तुझ सा देखूँ टूट जाएँ कि पिघल जाएँ मिरे कच्चे घड़े तुझ को मैं देखूँ कि ये आग का दरिया देखूँ

Parveen Shakir

2 likes

दुआ का टूटा हुआ हर्फ़ सर्द आह में है तिरी जुदाई का मंज़र अभी निगाह में है तिरे बदलने के बा-वस्फ़ तुझ को चाहा है ये ए'तिराफ़ भी शामिल मिरे गुनाह में है अज़ाब देगा तो फिर मुझ को ख़्वाब भी देगा मैं मुतमइन हूँ मिरा दिल तिरी पनाह में है बिखर चुका है मगर मुस्कुरा के मिलता है वो रख रखाव अभी मेरे कज-कुलाह में है जिसे बहार के मेहमान ख़ाली छोड़ गए वो इक मकान अभी तक मकीं की चाह में है यही वो दिन थे जब इक दूसरे को पाया था हमारी साल-गिरह ठीक अब के माह में है मैं बच भी जाऊँ तो तन्हाई मार डालेगी मिरे क़बीले का हर फ़र्द क़त्ल-गाह में है

Parveen Shakir

1 likes

अब भला छोड़ के घर क्या करते शाम के वक़्त सफ़र क्या करते तेरी मसरूफ़ियतें जानते हैं अपने आने की ख़बर क्या करते जब सितारे ही नहीं मिल पाए ले के हम शम्स-ओ-क़मर क्या करते वो मुसाफ़िर ही खुली धूप का था साए फैला के शजर क्या करते ख़ाक ही अव्वल ओ आख़िर ठहरी कर के ज़र्रे को गुहर क्या करते राय पहले से बना ली तू ने दिल में अब हम तिरे घर क्या करते इश्क़ ने सारे सलीक़े बख़्शे हुस्न से कस्ब-ए-हुनर क्या करते

Parveen Shakir

1 likes

अब इतनी सादगी लाएँ कहाँ से ज़मीं की ख़ैर माँगे आसमाँ से अगर चाहें तो वो दीवार कर दें हमें अब कुछ नहीं कहना ज़बाँ से सितारा ही नहीं जब साथ देता तो कश्ती काम ले क्या बादबाँ से भटकने से मिले फ़ुर्सत तो पूछें पता मंज़िल का मीर-ए-कारवाँ से तवज्जोह बर्क़ की हासिल रही है सो है आज़ाद फ़िक्र-ए-आशियाँ से हवा को राज़-दाँ हम ने बनाया और अब नाराज़ ख़ुशबू के बयाँ से ज़रूरी हो गई है दिल की ज़ीनत मकीं पहचाने जाते हैं मकाँ से फ़ना-फ़िल-इश्क़ होना चाहते थे मगर फ़ुर्सत न थी कार-ए-जहाँ से वगर्ना फ़स्ल-ए-गुल की क़द्र क्या थी बड़ी हिकमत है वाबस्ता ख़िज़ाँ से किसी ने बात की थी हँस के शायद ज़माने भर से हैं हम ख़ुद गुमाँ से मैं इक इक तीर पे ख़ुद ढाल बनती अगर होता वो दुश्मन की कमाँ से जो सब्ज़ा देख कर ख़े में लगाएँ उन्हें तकलीफ़ क्यूँँ पहुँचे ख़िज़ाँ से जो अपने पेड़ जलते छोड़ जाएँ उन्हें क्या हक़ कि रूठें बाग़बाँ से

Parveen Shakir

0 likes

Similar Writers

View All ›

Our suggestions based on Parveen Shakir.

Similar Moods

View All ›

More moods that pair well with Parveen Shakir's ghazal.