कल रात जो ईंधन के लिए कट के गिरा है चिड़ियों को बहुत प्यार था उस बूढे शजर से
Writer
Parveen Shakir
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Sher
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Ghazal
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Nazm
उस से इक बार तो रूठूँ मैं उसी की मानिंद और मेरी तरह से वो मुझ को मनाने आए
ये दुख नहीं कि अँधेरो से सुल्ह की हम ने मलाल ये है कि अब सुब्ह की तलब भी नहीं
मर भी जाऊँ तो कहाँ लोग भुला ही देंगे लफ़्ज़ मेरे मेरे होने की गवाही देंगे
ये क्या कि वो जब चाहे मुझे छीन ले मुझ से अपने लिए वो शख़्स तड़पता भी तो देखूँ
दुख तो ऐसा है कि दिल आँख से कट कट के बहे एक वा'दा है कि रोने नहीं देता मुझ को
वो मुसाफ़िर ही खुली धूप का था साए फैला के शजर क्या करते
तुझ को क्या इल्म तुझे हारने वाले कुछ लोग किस क़दर सख़्त नदामत से तुझे देखते हैं
लड़कियों के दुख अजब होते हैं सुख उस से अजीब हँस रही हैं और काजल भीगता है साथ साथ
हाथ मेरे भूल बैठे दस्तकें देने का फ़न बंद मुझ पर जब से उस के घर का दरवाज़ा हुआ
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