ghazalKuch Alfaaz

अब के बरस होंटों से मेरे तिश्ना-लबी भी ख़त्म हुई तुझ से मिलने की ऐ दरिया मजबूरी भी ख़त्म हुई कैसा प्यार कहाँ की उल्फ़त इश्क़ की बात तो जाने दो मेरे लिए अब उस के दिल से हमदर्दी भी ख़त्म हुई सामने वाली बिल्डिंग में अब काम है बस आराइश का कल तक जो मिलती थी हमें वो मज़दूरी भी ख़त्म हुई जेल से वापस आ कर उस ने पांचों वक़्त नमाज़ पढ़ी मुँह भी बंद हुए सब के और बदनामी भी ख़त्म हुई जिस की जल-धारा से बस्ती वाले जीवन पाते थे रस्ता बदलते ही नद्दी के वो बस्ती भी ख़त्म हुई

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पूछ लेते वो बस मिज़ाज मिरा कितना आसान था इलाज मिरा चारा-गर की नज़र बताती है हाल अच्छा नहीं है आज मिरा मैं तो रहता हूँ दश्त में मसरूफ़ क़ैस करता है काम-काज मिरा कोई कासा मदद को भेज अल्लाह मेरे बस में नहीं है ताज मिरा मैं मोहब्बत की बादशाहत हूँ मुझ पे चलता नहीं है राज मिरा

Fahmi Badayuni

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तेरे पीछे होगी दुनिया पागल बन क्या बोला मैं ने कुछ समझा? पागल बन सहरा में भी ढूँढ़ ले दरिया पागल बन वरना मर जाएगा प्यासा पागल बन आधा दाना आधा पागल नइँ नइँ नइँ उस को पाना है तो पूरा पागल बन दानाई दिखलाने से कुछ हासिल नहीं पागल खाना है ये दुनिया पागल बन देखें तुझ को लोग तो पागल हो जाएँ इतना उम्दा इतना आला पागल बन लोगों से डर लगता है तो घर में बैठ जिगरा है तो मेरे जैसा पागल बन

Varun Anand

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उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे

Tehzeeb Hafi

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मुझे उदास कर गए हो ख़ुश रहो मिरे मिज़ाज पर गए हो ख़ुश रहो मिरे लिए न रुक सके तो क्या हुआ जहाँ कहीं ठहर गए हो ख़ुश रहो ख़ुशी हुई है आज तुम को देख कर बहुत निखर सँवर गए हो ख़ुश रहो उदास हो किसी की बे-वफ़ाई पर वफ़ा कहीं तो कर गए हो ख़ुश रहो गली में और लोग भी थे आश्ना हमें सलाम कर गए हो ख़ुश रहो तुम्हें तो मेरी दोस्ती पे नाज़ था इसी से अब मुकर गए हो ख़ुश रहो किसी की ज़िन्दगी बनो कि बंदगी मिरे लिए तो मर गए हो ख़ुश रहो

Fazil Jamili

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मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता

Tehzeeb Hafi

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जब मिरे होंटों पे मेरी तिश्नगी रह जाएगी तेरी आँखों में भी थोड़ी सी नमी रह जाएगी सर-फिरा झोंका हवा का तोड़ देगा शाख़ को फूल बनने की तमन्ना में कली रह जाएगी ख़त्म हो जाएगा जिस दिन भी तुम्हारा इंतिज़ार घर के दरवाज़े पे दस्तक चीख़ती रह जाएगी क्या ख़बर थी आएगा इक रोज़ ऐसा वक़्त भी मेरी गोयाई तिरा मुँह देखती रह जाएगी वक़्त-ए-रुख़्सत आएगा और ख़त्म होगा ये सफ़र मेरे दिल की बात मेरे दिल में ही रह जाएगी

Tahir Faraz

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कोई हसीं मंज़र आँखों से जब ओझल हो जाएगा मुझ को पागल कहने वाला ख़ुद ही पागल हो जाएगा पलकों पे उस की जले बुझेंगे जुगनू जब मिरी यादों के कमरे में होंगी बरसातें घर जंगल हो जाएगा जिस दिन उस की ज़ुल्फ़ें उस के शानों पर खुल जाएँगी उस दिन शर्म से पानी पानी ख़ुद बादल हो जाएगा जब भी वो पाकीज़ा दामन आ जाएगा हाथ मिरे आँखों का ये मेला पानी गंगा-जल हो जाएगा उस की यादें उस की बातें उस की वफ़ाएँ उस का प्यार किस को ख़बर थी जीना मुश्किल एक इक पल हो जाएगा मत घबरा ऐ प्यासे दरिया सूरज आने वाला है बर्फ़ पहाड़ों से पिघली तो जल ही जल हो जाएगा

Tahir Faraz

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में न कहता था कि शहरों में न जा यार मिरे सोंधी मिट्टी ही में होती है वफ़ा यार मिरे कोई टूटे हुए ख़्वाबों से कहाँ मिलता है हर जगह दर्द का बिस्तर न लगा यार मिरे सिलसिला फिर से जुड़ा है तो जुड़ा रहने दे दिल के रिश्तों को तमाशा न बना यार मिरे अपनी चाहत के शब-ओ-रोज़ मुकम्मल कर ले जा ये सूरज भी तिरे नाम किया यार मिरे तुझ से मिलता हूँ तो रिश्ता कोई याद आता है सिलसिला मुझ से ज़ियादा न बढ़ा यार मिरे ऐसा लगता है कि कुछ टूट रहा है मुझ में छोड़ के तू मुझे इस वक़्त न जा यार मिरे ख़ुश-नसीबी से ये साअ'त तिरे हाथ आई है आसमाँ झुकने लगा हाथ बढ़ा यार मिरे

Tahir Faraz

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ग़म इस का कुछ नहीं है कि मैं काम आ गया ग़म ये है क़ातिलों में तिरा नाम आ गया जुगनू जले बुझे मिरी पलकों पे सुब्ह तक जब भी तिरा ख़याल सर-ए-शाम आ गया महसूस कर रहा हूँ मैं ख़ुशबू की बाज़गश्त शायद तिरे लबों पे मिरा नाम आ गया कुछ दोस्तों ने पूछा बताओ ग़ज़ल है क्या बे-साख़्ता लबों पे तिरा नाम आ गया मैं ने तो एक लाश की दी थी ख़बर 'फ़राज़' उल्टा मुझी पे क़त्ल का इल्ज़ाम आ गया

Tahir Faraz

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जिस ने तेरी याद में सज्दे किए थे ख़ाक पर उस के क़दमों के निशाँ पाए गए अफ़्लाक पर वाक़िआ''' ये कुन-फ़काँ से भी बहुत पहले का है इक बशर का नूर था क़िंदील में अफ़्लाक पर दोस्तों की महफ़िलों से दूर हम होते गए जैसे जैसे सिलवटें पड़ती गईं पोशाक पर मख़मली होंटों पे बोसों की नमी ठहरी हुई साँस उलझी ज़ुल्फ़ बिखरी सिलवटें पोशाक पर पानियों की साज़िशों ने जब भँवर डाले 'फ़राज़' तब्सिरा करते रहे सब डूबते तैराक पर

Tahir Faraz

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