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ज़िंदगी तेरे तअक़्क़ुब में हम इतना चलते हैं कि मर जाते हैं
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@tahir-faraz
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Ghazal
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Nazm
ज़िंदगी तेरे तअक़्क़ुब में हम इतना चलते हैं कि मर जाते हैं
तमाम दिन के दुखों का हिसाब करना है मैं चाहता हूँ कोई मेरे आस-पास न हो
नज़र बचा के गुज़रते हो तो गुज़र जाओ मैं आइना हूँ मेरी अपनी ज़िम्मेदारी है
जम्अ'' करता जो मैं आए हुए संग सर छुपाने के लिए घर होता
जब कभी बोलना वक़्त पर बोलना मुद्दतों सोचना मुख़्तसर बोलना
इस बुलंदी पे बहुत तन्हा हूँ काश मैं सब के बराबर होता
काश ऐसा कोई मंज़र होता मेरे काँधे पे तेरा सर होता
वो सर भी काट देता तो होता न कुछ मलाल अफ़्सोस ये है उस ने मेरी बात काट दी
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