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अब के सावन में शरारत ये मिरे साथ हुई मेरा घर छोड़ के कुल शहर में बरसात हुई आप मत पूछिए क्या हम पे सफ़र में गुज़री था लुटेरों का जहाँ गाँव वहीं रात हुई ज़िंदगी भर तो हुई गुफ़्तुगू ग़ैरों से मगर आज तक हम से हमारी न मुलाक़ात हुई हर ग़लत मोड़ पे टोका है किसी ने मुझ को एक आवाज़ तिरी जब से मिरे साथ हुई मैं ने सोचा कि मिरे देश की हालत क्या है एक क़ातिल से तभी मेरी मुलाक़ात हुई

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उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे

Tehzeeb Hafi

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यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले

Anand Raj Singh

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क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा

Javed Akhtar

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मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता

Tehzeeb Hafi

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ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो

Jaun Elia

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जब चले जाएँगे हम लौट के सावन की तरह याद आएँगे प्रथम प्यार के चुम्बन की तरह ज़िक्र जिस दम भी छिड़ा उन की गली में मेरा जाने शरमाए वो क्यूँँ गाँव की दुल्हन की तरह मेरे घर कोई ख़ुशी आती तो कैसे आती उम्र-भर साथ रहा दर्द महाजन की तरह कोई कंघी न मिली जिस से सुलझ पाती वो ज़िंदगी उलझी रही ब्रम्हा के दर्शन की तरह दाग़ मुझ में है कि तुझ में ये पता तब होगा मौत जब आएगी कपड़े लिए धोबन की तरह हर किसी शख़्स की क़िस्मत का यही है क़िस्सा आए राजा की तरह जाए वो निर्धन की तरह जिस में इंसान के दिल की न हो धड़कन 'नीरज' शाइ'री तो है वो अख़बार के कतरन की तरह

Gopaldas Neeraj

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बदन पे जिस के शराफ़त का पैरहन देखा वो आदमी भी यहाँ हम ने बद-चलन देखा ख़रीदने को जिसे कम थी दौलत-ए-दुनिया किसी कबीर की मुट्ठी में वो रतन देखा मुझे मिला है वहाँ अपना ही बदन ज़ख़्मी कहीं जो तीर से घाइल कोई हिरन देखा बड़ा न छोटा कोई फ़र्क़ बस नज़र का है सभी पे चलते समय एक सा कफ़न देखा ज़बाँ है और बयाँ और उस का मतलब और अजीब आज की दुनिया का व्याकरन देखा लुटेरे डाकू भी अपने पे नाज़ करने लगे उन्होंने आज जो संतों का आचरन देखा जो सादगी है कुहन में हमारे ऐ 'नीरज' किसी पे और भी क्या ऐसा बाँकपन देखा

Gopaldas Neeraj

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