अब शौक़ से कि जाँ से गुज़र जाना चाहिए बोल ऐ हवा-ए-शहर किधर जाना चाहिए कब तक इसी को आख़िरी मंज़िल कहेंगे हम कू-ए-मुराद से भी उधर जाना चाहिए वो वक़्त आ गया है कि साहिल को छोड़ कर गहरे समुंदरों में उतर जाना चाहिए अब रफ़्तगाँ की बात नहीं कारवाँ की है जिस सम्त भी हो गर्द-ए-सफ़र जाना चाहिए कुछ तो सुबूत-ए-ख़ून-ए-तमन्ना कहीं मिले है दिल तही तो आँख को भर जाना चाहिए या अपनी ख़्वाहिशों को मुक़द्दस न जानते या ख़्वाहिशों के साथ ही मर जाना चाहिए
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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ
Fahmi Badayuni
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बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं
Rehman Faris
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थोड़ा लिक्खा और ज़ियादा छोड़ दिया आने वालों के लिए रस्ता छोड़ दिया तुम क्या जानो उस दरिया पर क्या गुज़री तुम ने तो बस पानी भरना छोड़ दिया लड़कियाँ इश्क़ में कितनी पागल होती हैं फ़ोन बजा और चूल्हा जलता छोड़ दिया रोज़ इक पत्ता मुझ में आ गिरता है जब से मैं ने जंगल जाना छोड़ दिया बस कानों पर हाथ रखे थे थोड़ी देर और फिर उस आवाज़ ने पीछा छोड़ दिए
Tehzeeb Hafi
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छोड़ कर जाने का दस्तूर नहीं होता था कोई भी ज़ख़्म हो नासूर नहीं होता था मेरे भी होंठ पे सिगरेट नहीं होती थी उस की भी माँग में सिंदूर नहीं होता था औरतें प्यार में तब शौक़ नहीं रखती थी आदमी इश्क़ में मज़दूर नहीं होता था
Kushal Dauneria
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इस तरह से न आज़माओ मुझे उस की तस्वीर मत दिखाओ मुझे ऐन मुमकिन है मैं पलट आऊँ उस की आवाज़ में बुलाओ मुझे मैं ने बोला था याद मत आना झूठ बोला था याद आओ मुझे
Ali Zaryoun
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करूँँ न याद मगर किस तरह भुलाऊँ उसे ग़ज़ल बहाना करूँँ और गुनगुनाऊँ उसे वो ख़ार ख़ार है शाख़-ए-गुलाब की मानिंद मैं ज़ख़्म ज़ख़्म हूँ फिर भी गले लगाऊँ उसे ये लोग तज़्किरे करते हैं अपने लोगों के मैं कैसे बात करूँँ अब कहाँ से लाऊँ उसे मगर वो ज़ूद-फ़रामोश ज़ूद-रंज भी है कि रूठ जाए अगर याद कुछ दिलाऊँ उसे वही जो दौलत-ए-दिल है वही जो राहत-ए-जाँ तुम्हारी बात पे ऐ नासेहो गँवाऊँ उसे जो हम-सफ़र सर-ए-मंज़िल बिछड़ रहा है 'फ़राज़' अजब नहीं है अगर याद भी न आऊँ उसे
Ahmad Faraz
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फिर उसी रहगुज़ार पर शायद हम कभी मिल सकें मगर शायद जिन के हम मुंतज़िर रहे उन को मिल गए और हम-सफ़र शायद जान-पहचान से भी क्या होगा फिर भी ऐ दोस्त ग़ौर कर शायद अज्नबिय्यत की धुंध छट जाए चमक उट्ठे तिरी नज़र शायद ज़िंदगी भर लहू रुलाएगी याद-ए-यारान-ए-बे-ख़बर शायद जो भी बिछड़े वो कब मिले हैं 'फ़राज़' फिर भी तू इंतिज़ार कर शायद
Ahmad Faraz
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जिस से ये तबीअत बड़ी मुश्किल से लगी थी देखा तो वो तस्वीर हर इक दिल से लगी थी तन्हाई में रोते हैं कि यूँँ दिल को सुकूँ हो ये चोट किसी साहिब-ए-महफ़िल से लगी थी ऐ दिल तिरे आशोब ने फिर हश्र जगाया बे-दर्द अभी आँख भी मुश्किल से लगी थी ख़िल्क़त का अजब हाल था उस कू-ए-सितम में साए की तरह दामन-ए-क़ातिल से लगी थी उतरा भी तो कब दर्द का चढ़ता हुआ दरिया जब कश्ती-ए-जाँ मौत के साहिल से लगी थी
Ahmad Faraz
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आँख से दूर न हो दिल से उतर जाएगा वक़्त का क्या है गुज़रता है गुज़र जाएगा इतना मानूस न हो ख़ल्वत-ए-ग़म से अपनी तू कभी ख़ुद को भी देखेगा तो डर जाएगा डूबते डूबते कश्ती को उछाला दे दूँ मैं नहीं कोई तो साहिल पे उतर जाएगा ज़िंदगी तेरी अता है तो ये जाने वाला तेरी बख़्शिश तिरी दहलीज़ पे धर जाएगा ज़ब्त लाज़िम है मगर दुख है क़यामत का 'फ़राज़' ज़ालिम अब के भी न रोएगा तो मर जाएगा
Ahmad Faraz
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दिल बदन का शरीक-ए-हाल कहाँ हिज्र फिर हिज्र है विसाल कहाँ इश्क़ है नाम इंतिहाओं का इस समुंदर में एतिदाल कहाँ ऐसा नशातो ज़हर में भी न था ऐ ग़म-ए-दिल तिरी मिसाल कहाँ हम को भी अपनी पाएमाली का है मगर इस क़दर मलाल कहा मैं नई दोस्ती के मोड़ पे था आ गया है तिरा ख़याल कहा दिल कि ख़ुश-फ़हम था सो है वर्ना तेरे मिलने का एहतिमाल कहाँ वस्ल ओ हिज्रांहैं और दुनियाएं इन ज़मानों में माह-ओ-साल कहाँ तुझ को देखा तो लोग हैरांहैं आ गया शहर में ग़ज़ाल कहाँ तुझ पे लिक्खी तो सज गई है ग़ज़ल आ मिला ख़्वाब से ख़याल कहाँ अब तो शह मात हो रही है 'फ़राज़' अब बचाव की कोई चाल कहाँ
Ahmad Faraz
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