फिर उसी रहगुज़ार पर शायद हम कभी मिल सकें मगर शायद जिन के हम मुंतज़िर रहे उन को मिल गए और हम-सफ़र शायद जान-पहचान से भी क्या होगा फिर भी ऐ दोस्त ग़ौर कर शायद अज्नबिय्यत की धुंध छट जाए चमक उट्ठे तिरी नज़र शायद ज़िंदगी भर लहू रुलाएगी याद-ए-यारान-ए-बे-ख़बर शायद जो भी बिछड़े वो कब मिले हैं 'फ़राज़' फिर भी तू इंतिज़ार कर शायद
Related Ghazal
क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा
Javed Akhtar
371 likes
उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे
Tehzeeb Hafi
465 likes
वो मुँह लगाता है जब कोई काम होता है जो उस का होता है समझो ग़ुलाम होता है किसी का हो के दुबारा न आना मेरी तरफ़ मोहब्बतों में हलाला हराम होता है इसे भी गिनते हैं हम लोग अहल-ए-ख़ाना में हमारे याँ तो शजर का भी नाम होता है तुझ ऐसे शख़्स के होते हैं ख़ास दोस्त बहुत तुझ ऐसा शख़्स बहुत जल्द आम होता है कभी लगी है तुम्हें कोई शाम आख़िरी शाम हमारे साथ ये हर एक शाम होता है
Umair Najmi
81 likes
सुना है लोग उसे आँख भर के देखते हैं सो उस के शहर में कुछ दिन ठहर के देखते हैं सुना है रब्त है उस को ख़राब-हालों से सो अपने आप को बर्बाद कर के देखते हैं सुना है दर्द की गाहक है चश्म-ए-नाज़ उस की सो हम भी उस की गली से गुज़र के देखते हैं सुना है उस को भी है शे'र ओ शा'इरी से शग़फ़ सो हम भी मो'जिज़े अपने हुनर के देखते हैं सुना है बोले तो बातों से फूल झड़ते हैं ये बात है तो चलो बात कर के देखते हैं सुना है रात उसे चाँद तकता रहता है सितारे बाम-ए-फ़लक से उतर के देखते हैं सुना है दिन को उसे तितलियाँ सताती हैं सुना है रात को जुगनू ठहर के देखते हैं सुना है हश्र हैं उस की ग़ज़ाल सी आँखें सुना है उस को हिरन दश्त भर के देखते हैं सुना है रात से बढ़ कर हैं काकुलें उस की सुना है शाम को साए गुज़र के देखते हैं सुना है उस की सियह-चश्मगी क़यामत है सो उस को सुरमा-फ़रोश आह भर के देखते हैं सुना है उस के लबों से गुलाब जलते हैं सो हम बहार पे इल्ज़ाम धर के देखते हैं सुना है आइना तिमसाल है जबीं उस की जो सादा दिल हैं उसे बन-सँवर के देखते हैं सुना है जब से हमाइल हैं उस की गर्दन में मिज़ाज और ही लाल ओ गुहर के देखते हैं सुना है चश्म-ए-तसव्वुर से दश्त-ए-इम्काँ में पलंग ज़ाविए उस की कमर के देखते हैं सुना है उस के बदन की तराश ऐसी है कि फूल अपनी क़बाएँ कतर के देखते हैं वो सर्व-क़द है मगर बे-गुल-ए-मुराद नहीं कि उस शजर पे शगूफ़े समर के देखते हैं बस इक निगाह से लुटता है क़ाफ़िला दिल का सो रह-रवान-ए-तमन्ना भी डर के देखते हैं सुना है उस के शबिस्ताँ से मुत्तसिल है बहिश्त मकीं उधर के भी जल्वे इधर के देखते हैं रुके तो गर्दिशें उस का तवाफ़ करती हैं चले तो उस को ज़माने ठहर के देखते हैं किसे नसीब कि बे-पैरहन उसे देखे कभी कभी दर ओ दीवार घर के देखते हैं कहानियाँ ही सही सब मुबालग़े ही सही अगर वो ख़्वाब है ता'बीर कर के देखते हैं अब उस के शहर में ठहरें कि कूच कर जाएँ 'फ़राज़' आओ सितारे सफ़र के देखते हैं
Ahmad Faraz
65 likes
चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ सारे मर्द एक जैसे हैं तुम ने कैसे कह डाला मैं भी तो एक मर्द हूँ तुम को ख़ुद से बेहतर मानता हूँ मैं ने उस सेे प्यार किया है मिल्कियत का दावा नहीं वो जिस के भी साथ है मैं उस को भी अपना मानता हूँ चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ
Ali Zaryoun
105 likes
More from Ahmad Faraz
क्यूँँ तबीअत कहीं ठहरती नहीं दोस्ती तो उदास करती नहीं हम हमेशा के सैर-चश्म सही तुझ को देखें तो आँख भरती नहीं शब-ए-हिज्राँ भी रोज़-ए-बद की तरह कट तो जाती है पर गुज़रती नहीं ये मोहब्बत है, सुन, ज़माने, सुन! इतनी आसानियों से मरती नहीं जिस तरह तुम गुजारते हो फ़राज़ ज़िन्दगी उस तरह गुज़रती नहीं
Ahmad Faraz
6 likes
क्या ऐसे कम-सुख़न से कोई गुफ़्तुगू करे जो मुस्तक़िल सुकूत से दिल को लहू करे अब तो हमें भी तर्क-ए-मरासिम का दुख नहीं पर दिल ये चाहता है कि आग़ाज़ तू करे तेरे बग़ैर भी तो ग़नीमत है ज़िंदगी ख़ुद को गँवा के कौन तिरी जुस्तुजू करे अब तो ये आरज़ू है कि वो ज़ख़्म खाइए ता-ज़िंदगी ये दिल न कोई आरज़ू करे तुझ को भुला के दिल है वो शर्मिंदा-ए-नज़र अब कोई हादसा ही तिरे रू-ब-रू करे चुप-चाप अपनी आग में जलते रहो 'फ़राज़' दुनिया तो अर्ज़-ए-हाल से बे-आबरू करे
Ahmad Faraz
8 likes
करूँँ न याद मगर किस तरह भुलाऊँ उसे ग़ज़ल बहाना करूँँ और गुनगुनाऊँ उसे वो ख़ार ख़ार है शाख़-ए-गुलाब की मानिंद मैं ज़ख़्म ज़ख़्म हूँ फिर भी गले लगाऊँ उसे ये लोग तज़्किरे करते हैं अपने लोगों के मैं कैसे बात करूँँ अब कहाँ से लाऊँ उसे मगर वो ज़ूद-फ़रामोश ज़ूद-रंज भी है कि रूठ जाए अगर याद कुछ दिलाऊँ उसे वही जो दौलत-ए-दिल है वही जो राहत-ए-जाँ तुम्हारी बात पे ऐ नासेहो गँवाऊँ उसे जो हम-सफ़र सर-ए-मंज़िल बिछड़ रहा है 'फ़राज़' अजब नहीं है अगर याद भी न आऊँ उसे
Ahmad Faraz
3 likes
वहशतें बढ़ती गईं हिज्र के आज़ार के साथ अब तो हम बात भी करते नहीं ग़म-ख़्वार के साथ हम ने इक उम्र बसर की है ग़म-ए-यार के साथ 'मीर' दो दिन न जिए हिज्र के आज़ार के साथ अब तो हम घर से निकलते हैं तो रख देते हैं ताक़ पर इज़्ज़त-ए-सादात भी दस्तार के साथ इस क़दर ख़ौफ़ है अब शहर की गलियों में कि लोग चाप सुनते हैं तो लग जाते हैं दीवार के साथ एक तो ख़्वाब लिए फिरते हो गलियों गलियों उस पे तकरार भी करते हो ख़रीदार के साथ शहर का शहर ही नासेह हो तो क्या कीजिएगा वर्ना हम रिंद तो भिड़ जाते हैं दो-चार के साथ हम को उस शहर में ता'मीर का सौदा है जहाँ लोग में'मार को चुन देते हैं दीवार के साथ जो शरफ़ हम को मिला कूचा-ए-जानाँ से 'फ़राज़' सू-ए-मक़्तल भी गए हैं उसी पिंदार के साथ
Ahmad Faraz
3 likes
उस को जुदा हुए भी ज़माना बहुत हुआ अब क्या कहें ये क़िस्सा पुराना बहुत हुआ हम ख़ुल्द से निकल तो गए हैं पर ऐ ख़ुदा इतने से वाक़िए का फ़साना बहुत हुआ अब हम हैं और सारे ज़माने की दुश्मनी उस से ज़रा सा रब्त बढ़ाना बहुत हुआ अब क्यूँँंन ज़िंदगी पे मोहब्बत को वार दें इस आशिक़ी में जान से जाना बहुत हुआ अब तक तो दिल का दिल से तआ'रुफ़ न हो सका माना कि उस से मिलना मिलाना बहुत हुआ क्या क्या न हम ख़राब हुए हैं मगर ये दिल ऐ याद-ए-यार तेरा ठिकाना बहुत हुआ कहता था नासेहों से मिरे मुँह न आइयो फिर क्या था एक हूँ का बहाना बहुत हुआ लो फिर तिरे लबों पे उसी बे-वफ़ा का ज़िक्र अहमद-'फ़राज़' तुझ से कहा न बहुत हुआ
Ahmad Faraz
8 likes
Similar Writers
Our suggestions based on Ahmad Faraz.
Similar Moods
More moods that pair well with Ahmad Faraz's ghazal.







