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अब तिरी याद से वहशत नहीं होती मुझ को ज़ख़्म खुलते हैं अज़िय्यत नहीं होती मुझ को अब कोई आए चला जाए मैं ख़ुश रहता हूँ अब किसी शख़्स की आदत नहीं होती मुझ को ऐसा बदला हूँ तिरे शहर का पानी पी कर झूट बोलूँ तो नदामत नहीं होती मुझ को है अमानत में ख़यानत सो किसी की ख़ातिर कोई मरता है तो हैरत नहीं होती मुझ को तू जो बदले तिरी तस्वीर बदल जाती है रंग भरने में सुहूलत नहीं होती मुझ को अक्सर औक़ात मैं ता'बीर बता देता हूँ बाज़ औक़ात इजाज़त नहीं होती मुझ को इतना मसरूफ़ हूँ जीने की हवस में 'शाहिद' साँस लेने की भी फ़ुर्सत नहीं होती मुझ को

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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ

Fahmi Badayuni

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कैसे उस ने ये सब कुछ मुझ सेे छुप कर बदला चेहरा बदला रस्ता बदला बा'द में घर बदला मैं उस के बारे में ये कहता था लोगों से मेरा नाम बदल देना वो शख़्स अगर बदला वो भी ख़ुश था उस ने दिल देकर दिल माँगा है मैं भी ख़ुश हूँ मैं ने पत्थर से पत्थर बदला मैं ने कहा क्या मेरी ख़ातिर ख़ुद को बदलोगे और फिर उस ने नज़रें बदलीं और नंबर बदला

Tehzeeb Hafi

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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को

Naseer Turabi

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ज़बाँ तो खोल नज़र तो मिला जवाब तो दे मैं कितनी बार लुटा हूँ मुझे हिसाब तो दे तेरे बदन की लिखावट में है उतार चढ़ाव मैं तुझे कैसे पढूँगा मुझे किताब तो दे तेरा सवाल है साक़ी कि ज़िंदगी क्या है? जवाब देता हूँ पहले मुझे शराब तो दे

Rahat Indori

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बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं

Rehman Faris

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बस रूह सच है बाक़ी कहानी फ़रेब है जो कुछ भी है ज़मीनी ज़मानी फ़रेब है रंग अपने अपने वक़्त पे खुलते हैं आँख पर अव्वल फ़रेब है कोई सानी फ़रेब है सौदागरान-ए-शोलगी-ए-शर के दोश पर मुश्कीज़-गाँ से झाँकता पानी फ़रेब है इस घूमती ज़मीं पे दोबारा मिलेंगे हम हिजरत फ़रार नक़्ल-ए-मकानी फ़रेब है दरिया की अस्ल तैरती लाशों से पूछिए ठहराव एक चाल रवानी फ़रेब है अब शाम हो गई है तो सूरज को रोइए हम ने कहा न था कि जवानी फ़रेब है बार-ए-दिगर समय से किसी का गुज़र नहीं आइंदगाँ के हक़ में निशानी फ़रेब है इल्म इक हिजाब और हवा से आइने का ज़ंग निस्यान हक़ है याद-दहानी फ़रेब है तज्सीम कर कि ख़्वाब की दुनिया है जावेदाँ तस्लीम कर कि आलम-ए-फ़ानी फ़रेब है 'शाहिद' दारोग़-गोई-ए-गुलज़ार पर न जा तितली से पूछ रंग-फ़िशानी फ़रेब है

Shahid Zaki

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जिधर भी देखिए इक रास्ता बना हुआ है सफ़र हमारे लिए मसअला बना हुआ है मैं सर-ब-सज्दा सकूँ में नहीं सफ़र में हूँ जबीं पे दाग़ नहीं आबला बना हुआ है मैं क्या करूँँ मिरा गोशा-नशीन होना भी पड़ोसियों के लिए वाक़िआ' बना हुआ है मगर मैं इश्क़ में परहेज़ से बंधा हुआ हूँ तिरा वजूद तो ख़ुश-ज़ाएक़ा बना हुआ है बुरीदा शाख़ें हैं या शम्'अ-हा-ए-गुल-शुदा हैं ख़मीदा पेड़ है या मक़बरा बना हुआ है मिरे गुनह दर-ओ-दीवार से झलक रहे हैं मकान मेरे लिए आईना बना हुआ है शुऊरी कोशिशें मंज़र बिगाड़ देती हैं वही भला है जो बे-साख़्ता बना हुआ है किसी दुआ के लिए हाथ उठे हुए 'शाहिद' किसी दिए के लिए ताक़चा बना हुआ है

Shahid Zaki

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मेरे ख़ुदा किसी सूरत उसे मिला मुझ से मेरे वजूद का हिस्सा न रख जुदा मुझ से वो ना-समझ मुझे पत्थर समझ के छोड़ गया वो चाहता तो सितारे तराशता मुझ से उस एक ख़त ने सुख़न-वर बना दिया मुझ को वो एक ख़त कि जो लिक्खा नहीं गया मुझ से उसे ही साथ गवारा न था मेरा वर्ना किसे मजाल कोई उस को छीनता मुझ से अभी विसाल के ज़ख़्मों से ख़ून रिसता है अभी ख़फ़ा है मोहब्बत का देवता मुझ से है आरज़ू कि पलट जाऊँ आसमाँ की तरफ़ मिज़ाज अहल-ए-ज़मीं का नहीं मिला मुझ से ख़ता के बा'द अजब कश्मकश रही 'शाहिद' ख़ता से मैं रहा शर्मिंदा और ख़ता मुझ से

Shahid Zaki

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यूँँ तो नहीं कि पहले सहारे बनाए थे दरिया बना के उस ने किनारे बनाए थे कूज़े बनाने वाले को उजलत अजीब थी पूरे नहीं बनाए थे सारे बनाए थे अब इशरत-ओ-नशात का सामान हूँ तो हूँ हम ने तो दीप ख़ौफ़ के मारे बनाए थे दी है उसी ने प्यास बुझाने को आग भी पानी से जिस ने जिस्म हमारे बनाए थे फिर यूँँ हुआ कि उस की ज़बाँ काट दी गई वो जिस ने गुफ़्तुगू के इशारे बनाए थे सहरा पे बादलों का हुनर खुल नहीं सका क़तरे बनाए थे कि शरारे बनाए थे 'शाहिद' ख़फ़ा था कातिब-ए-तक़दीर इस लिए हम ने ज़मीं पे अपने सितारे बनाए थे

Shahid Zaki

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रात सी नींद है महताब उतारा जाए ऐ ख़ुदा मुझ में ज़र-ए-ख़्वाब उतारा जाए क्या ज़रूरी है कि नाव को बचाने के लिए हर मुसाफ़िर तह-ए-गिर्दाब उतारा जाए रोज़ उतरता है समुंदर में सुलगता सूरज कभी सहरा में भी तालाब उतारा जाए सौ चराग़ों के जलाने से कहीं अच्छा है इक सितारा सर-ए-मेहराब उतारा जाए पत्थरों में भी कई पेच पड़े हैं 'शाहिद' उन पे भी मौसम-ए-शादाब उतारा जाए

Shahid Zaki

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