रात सी नींद है महताब उतारा जाए ऐ ख़ुदा मुझ में ज़र-ए-ख़्वाब उतारा जाए क्या ज़रूरी है कि नाव को बचाने के लिए हर मुसाफ़िर तह-ए-गिर्दाब उतारा जाए रोज़ उतरता है समुंदर में सुलगता सूरज कभी सहरा में भी तालाब उतारा जाए सौ चराग़ों के जलाने से कहीं अच्छा है इक सितारा सर-ए-मेहराब उतारा जाए पत्थरों में भी कई पेच पड़े हैं 'शाहिद' उन पे भी मौसम-ए-शादाब उतारा जाए
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पागल कैसे हो जाते हैं देखो ऐसे हो जाते हैं ख़्वाबों का धंधा करती हो कितने पैसे हो जाते हैं दुनिया सा होना मुश्किल है तेरे जैसे हो जाते हैं मेरे काम ख़ुदा करता है तेरे वैसे हो जाते हैं
Ali Zaryoun
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किसी लिबास की ख़ुशबू जब उड़ के आती है तेरे बदन की जुदाई बहुत सताती है तेरे गुलाब तरसते हैं तेरी ख़ुशबू को तेरी सफ़ेद चमेली तुझे बुलाती है तेरे बग़ैर मुझे चैन कैसे पड़ता हैं मेरे बगैर तुझे नींद कैसे आती है
Jaun Elia
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हम ने कब चाहा कि वो शख़्स हमारा हो जाए इतना दिख जाए कि आँखों का गुज़ारा हो जाए हम जिसे पास बिठा लें वो बिछड़ जाता है तुम जिसे हाथ लगा दो वो तुम्हारा हो जाए तुम को लगता है कि तुम जीत गए हो मुझ से है यही बात तो फिर खेल दुबारा हो जाए है मोहब्बत भी अजब तर्ज़-ए-तिजारत कि यहाँ हर दुकाँ-दार ये चाहे कि ख़सारा हो जाए
Yasir Khan
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तेरे पीछे होगी दुनिया पागल बन क्या बोला मैं ने कुछ समझा? पागल बन सहरा में भी ढूँढ़ ले दरिया पागल बन वरना मर जाएगा प्यासा पागल बन आधा दाना आधा पागल नइँ नइँ नइँ उस को पाना है तो पूरा पागल बन दानाई दिखलाने से कुछ हासिल नहीं पागल खाना है ये दुनिया पागल बन देखें तुझ को लोग तो पागल हो जाएँ इतना उम्दा इतना आला पागल बन लोगों से डर लगता है तो घर में बैठ जिगरा है तो मेरे जैसा पागल बन
Varun Anand
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बा'द में मुझ से ना कहना घर पलटना ठीक है वैसे सुनने में यही आया है रस्ता ठीक है शाख से पत्ता गिरे, बारिश रुके, बादल छटें मैं ही तो सब कुछ ग़लत करता हूँ अच्छा ठीक है जेहन तक तस्लीम कर लेता है उस की बरतरी आँख तक तस्दीक़ कर देती है बंदा ठीक है एक तेरी आवाज़ सुनने के लिए ज़िंदा है हम तू ही जब ख़ामोश हो जाए तो फिर क्या ठीक है
Tehzeeb Hafi
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मेरे ख़ुदा किसी सूरत उसे मिला मुझ से मेरे वजूद का हिस्सा न रख जुदा मुझ से वो ना-समझ मुझे पत्थर समझ के छोड़ गया वो चाहता तो सितारे तराशता मुझ से उस एक ख़त ने सुख़न-वर बना दिया मुझ को वो एक ख़त कि जो लिक्खा नहीं गया मुझ से उसे ही साथ गवारा न था मेरा वर्ना किसे मजाल कोई उस को छीनता मुझ से अभी विसाल के ज़ख़्मों से ख़ून रिसता है अभी ख़फ़ा है मोहब्बत का देवता मुझ से है आरज़ू कि पलट जाऊँ आसमाँ की तरफ़ मिज़ाज अहल-ए-ज़मीं का नहीं मिला मुझ से ख़ता के बा'द अजब कश्मकश रही 'शाहिद' ख़ता से मैं रहा शर्मिंदा और ख़ता मुझ से
Shahid Zaki
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बस रूह सच है बाक़ी कहानी फ़रेब है जो कुछ भी है ज़मीनी ज़मानी फ़रेब है रंग अपने अपने वक़्त पे खुलते हैं आँख पर अव्वल फ़रेब है कोई सानी फ़रेब है सौदागरान-ए-शोलगी-ए-शर के दोश पर मुश्कीज़-गाँ से झाँकता पानी फ़रेब है इस घूमती ज़मीं पे दोबारा मिलेंगे हम हिजरत फ़रार नक़्ल-ए-मकानी फ़रेब है दरिया की अस्ल तैरती लाशों से पूछिए ठहराव एक चाल रवानी फ़रेब है अब शाम हो गई है तो सूरज को रोइए हम ने कहा न था कि जवानी फ़रेब है बार-ए-दिगर समय से किसी का गुज़र नहीं आइंदगाँ के हक़ में निशानी फ़रेब है इल्म इक हिजाब और हवा से आइने का ज़ंग निस्यान हक़ है याद-दहानी फ़रेब है तज्सीम कर कि ख़्वाब की दुनिया है जावेदाँ तस्लीम कर कि आलम-ए-फ़ानी फ़रेब है 'शाहिद' दारोग़-गोई-ए-गुलज़ार पर न जा तितली से पूछ रंग-फ़िशानी फ़रेब है
Shahid Zaki
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जिधर भी देखिए इक रास्ता बना हुआ है सफ़र हमारे लिए मसअला बना हुआ है मैं सर-ब-सज्दा सकूँ में नहीं सफ़र में हूँ जबीं पे दाग़ नहीं आबला बना हुआ है मैं क्या करूँँ मिरा गोशा-नशीन होना भी पड़ोसियों के लिए वाक़िआ' बना हुआ है मगर मैं इश्क़ में परहेज़ से बंधा हुआ हूँ तिरा वजूद तो ख़ुश-ज़ाएक़ा बना हुआ है बुरीदा शाख़ें हैं या शम्'अ-हा-ए-गुल-शुदा हैं ख़मीदा पेड़ है या मक़बरा बना हुआ है मिरे गुनह दर-ओ-दीवार से झलक रहे हैं मकान मेरे लिए आईना बना हुआ है शुऊरी कोशिशें मंज़र बिगाड़ देती हैं वही भला है जो बे-साख़्ता बना हुआ है किसी दुआ के लिए हाथ उठे हुए 'शाहिद' किसी दिए के लिए ताक़चा बना हुआ है
Shahid Zaki
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यूँँ तो नहीं कि पहले सहारे बनाए थे दरिया बना के उस ने किनारे बनाए थे कूज़े बनाने वाले को उजलत अजीब थी पूरे नहीं बनाए थे सारे बनाए थे अब इशरत-ओ-नशात का सामान हूँ तो हूँ हम ने तो दीप ख़ौफ़ के मारे बनाए थे दी है उसी ने प्यास बुझाने को आग भी पानी से जिस ने जिस्म हमारे बनाए थे फिर यूँँ हुआ कि उस की ज़बाँ काट दी गई वो जिस ने गुफ़्तुगू के इशारे बनाए थे सहरा पे बादलों का हुनर खुल नहीं सका क़तरे बनाए थे कि शरारे बनाए थे 'शाहिद' ख़फ़ा था कातिब-ए-तक़दीर इस लिए हम ने ज़मीं पे अपने सितारे बनाए थे
Shahid Zaki
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बिन माँगे मिल रहा हो तो ख़्वाहिश फ़ुज़ूल है सूरज से रौशनी की गुज़ारिश फ़ुज़ूल है किसी ने कहा था टूटी हुई नाव में चलो दरिया के साथ आप की रंजिश फ़ुज़ूल है नाबूद के सुराग़ की सूरत निकालिए मौजूद की नुमूद ओ नुमाइश फ़ुज़ूल है मैं आप अपनी मौत की तय्यारियों में हूँ मेरे ख़िलाफ़ आप की साज़िश फ़ुज़ूल है ऐ आसमान तेरी इनायत बजा मगर फ़सलें पकी हुई हों तो बारिश फ़ुज़ूल है जी चाहता है कह दूँ ज़मीन ओ ज़माँ से मैं मंज़िल अगर नहीं है तो गर्दिश फ़ुज़ूल है इनआम-ए-नंग-ओ-नाम मिरे काम के नहीं मज्ज़ूब हूँ सो मेरी सताइश फ़ुज़ूल है
Shahid Zaki
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