ghazalKuch Alfaaz

बा'द में मुझ से ना कहना घर पलटना ठीक है वैसे सुनने में यही आया है रस्ता ठीक है शाख से पत्ता गिरे, बारिश रुके, बादल छटें मैं ही तो सब कुछ ग़लत करता हूँ अच्छा ठीक है जेहन तक तस्लीम कर लेता है उस की बरतरी आँख तक तस्दीक़ कर देती है बंदा ठीक है एक तेरी आवाज़ सुनने के लिए ज़िंदा है हम तू ही जब ख़ामोश हो जाए तो फिर क्या ठीक है

Tehzeeb Hafi182 Likes

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उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे

Tehzeeb Hafi

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बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं

Rehman Faris

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यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले

Anand Raj Singh

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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को

Naseer Turabi

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मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता

Tehzeeb Hafi

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अश्क ज़ाया' हो रहे थे देख कर रोता न था जिस जगह बनता था रोना मैं उधर रोता न था सिर्फ़ तेरी चुप ने मेरे गाल गीले कर दिए मैं तो वो हूँ जो किसी की मौत पर रोता न था मुझ पे कितने सानिहे गुज़रे पर उन आँखों को क्या मेरा दुख ये हैं कि मेरा हम सफ़र रोता न था मैं ने उस के वस्ल में भी हिज्र काटा है कहीं वो मेरे काँधे पे रख लेता था सर रोता न था प्यार तो पहले भी उस सेे था मगर इतना नहीं तब मैं उस को छू तो लेता था मगर रोता न था गिर्या-ओ-ज़ारी को भी इक ख़ास मौसम चाहिए मेरी आँखें देख लो मैं वक़्त पर रोता न था

Tehzeeb Hafi

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अजीब ख़्वाब था उस के बदन में काई थी वो इक परी जो मुझे सब्ज़ करने आई थी वो इक चराग़-कदा जिस में कुछ नहीं था मेरा वो जल रही थी वो क़िंदील भी पराई थी न जाने कितने परिंदों ने इस में शिरकत की कल एक पेड़ की तरक़ीब-ए-रू-नुमाई थी हवाओं आओ मिरे गाँव की तरफ़ देखो जहाँ ये रेत है पहले यहाँ तराई थी किसी सिपाह ने ख़े में लगा दिए हैं वहाँ जहाँ ये मैं ने निशानी तिरी दबाई थी गले मिला था कभी दुख भरे दिसम्बर से मिरे वजूद के अंदर भी धुँद छाई थी

Tehzeeb Hafi

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जाने वाले से राब्ता रह जाए घर की दीवार पर दिया रह जाए इक नज़र जो भी देख ले तुझ को वो तिरे ख़्वाब देखता रह जाए इतनी गिर्हें लगी हैं इस दिल पर कोई खोले तो खोलता रह जाए कोई कमरे में आग तापता हो कोई बारिश में भीगता रह जाए नींद ऐसी कि रात कम पड़ जाए ख़्वाब ऐसा कि मुँह खुला रह जाए झील सैफ़-उल-मुलूक पर जाऊँ और कमरे में कैमरा रह जाए

Tehzeeb Hafi

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ख़ुद पर जब इश्क़ की वहशत को मुसल्लत करूँँगा इस कदर ख़ाक उड़ाऊँगा कयामत करूँँगा हिज्र की रात मेरी जान को आई हुई है बच गया तो मैं मोहब्बत की मज़म्मत करूँँगा अब तेरे राज़ सँभाले नहीं जाते मुझ सेे मैं किसी रोज़ अमानत में ख़यानत करूँँगा लयलातुल क़दर गुज़रेंगे किसी जंगल में नूर बरसेगा दरख़्तों की इमामत करूँँगा

Tehzeeb Hafi

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चीख़ते हैं दर-ओ-दीवार नहीं होता मैं आँख खुलने पे भी बेदार नहीं होता मैं ख़्वाब करना हो सफ़र करना हो या रोना हो मुझ में ख़ूबी है बेज़ार नहीं होता में अब भला अपने लिए बनना सँवरना कैसा ख़ुद से मिलना हो तो तय्यार नहीं होता मैं कौन आएगा भला मेरी अयादत के लिए बस इसी ख़ौफ़ से बीमार नहीं होता मैं मंज़िल-ए-इश्क़ पे निकला तो कहा रस्ते ने हर किसी के लिए हमवार नहीं होता मैं तेरी तस्वीर से तस्कीन नहीं होती मुझे तेरी आवाज़ से सरशार नहीं होता मैं लोग कहते हैं मैं बारिश की तरह हूँ 'हाफ़ी' अक्सर औक़ात लगातार नहीं होता मैं

Tehzeeb Hafi

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