ख़ुद पर जब इश्क़ की वहशत को मुसल्लत करूँँगा इस कदर ख़ाक उड़ाऊँगा कयामत करूँँगा हिज्र की रात मेरी जान को आई हुई है बच गया तो मैं मोहब्बत की मज़म्मत करूँँगा अब तेरे राज़ सँभाले नहीं जाते मुझ सेे मैं किसी रोज़ अमानत में ख़यानत करूँँगा लयलातुल क़दर गुज़रेंगे किसी जंगल में नूर बरसेगा दरख़्तों की इमामत करूँँगा
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तुम हक़ीक़त नहीं हो हसरत हो जो मिले ख़्वाब में वो दौलत हो तुम हो ख़ुशबू के ख़्वाब की ख़ुशबू और इतने ही बेमुरव्वत हो किस तरह छोड़ दूँ तुम्हें जानाँ तुम मेरी ज़िन्दगी की आदत हो किसलिए देखते हो आईना तुम तो ख़ुद से भी ख़ूब-सूरत हो दास्ताँ ख़त्म होने वाली है तुम मेरी आख़िरी मुहब्बत हो
Jaun Elia
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तेरी मुश्किल न बढ़ाऊँगा चला जाऊँगा अश्क आँखों में छुपाऊँगा चला जाऊँगा अपनी दहलीज़ पे कुछ देर पड़ा रहने दे जैसे ही होश में आऊँगा चला जाऊँगा ख़्वाब लेने कोई आए कि न आए कोई मैं तो आवाज़ लगाऊँगा चला जाऊँगा चंद यादें मुझे बच्चों की तरह प्यारी हैं उन को सीने से लगाऊँगा चला जाऊँगा मुद्दतों बा'द मैं आया हूँ पुराने घर में ख़ुद को जी भर के रुलाऊँगा चला जाऊँगा इस जज़ीरे में ज़ियादा नहीं रहना अब तो आजकल नाव बनाऊँगा चला जाऊँगा मौसम-ए-गुल की तरह लौट के आऊँगा 'हसन' हर तरफ़ फूल खिलाऊँगा चला जाऊँगा
Hasan Abbasi
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इतना मजबूर न कर बात बनाने लग जाएँ हम तेरे सर की क़सम झूठ ही खाने लग जाएँ इतने सन्नाटे पिए मेरी समा'अत ने कि अब सिर्फ़ आवाज़ पे चाहूँ तो निशाने लग जाएँ चलिए कुछ और नहीं आह-शुमारी ही सही हम किसी काम तो इस दिल के बहाने लग जाएँ हम वो गुम-गश्त-ए-मोहब्बत हैं कि तुम तो क्या हो ख़ुद को हम ढूँडने निकलें तो ज़माने लग जाएँ ख़्वाब कुछ ऐसे दिखाए हैं फ़क़ीरी ने मुझे जिन की ता'बीर में शाहों के ख़ज़ाने लग जाएँ मैं अगर अपनी जवानी के सुना दूँ क़िस्से ये जो लौंडे हैं मिरे पाँव दबाने लग जाएँ
Mehshar Afridi
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कैसे उस ने ये सब कुछ मुझ सेे छुप कर बदला चेहरा बदला रस्ता बदला बा'द में घर बदला मैं उस के बारे में ये कहता था लोगों से मेरा नाम बदल देना वो शख़्स अगर बदला वो भी ख़ुश था उस ने दिल देकर दिल माँगा है मैं भी ख़ुश हूँ मैं ने पत्थर से पत्थर बदला मैं ने कहा क्या मेरी ख़ातिर ख़ुद को बदलोगे और फिर उस ने नज़रें बदलीं और नंबर बदला
Tehzeeb Hafi
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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को
Naseer Turabi
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अश्क ज़ाया' हो रहे थे देख कर रोता न था जिस जगह बनता था रोना मैं उधर रोता न था सिर्फ़ तेरी चुप ने मेरे गाल गीले कर दिए मैं तो वो हूँ जो किसी की मौत पर रोता न था मुझ पे कितने सानिहे गुज़रे पर उन आँखों को क्या मेरा दुख ये हैं कि मेरा हम सफ़र रोता न था मैं ने उस के वस्ल में भी हिज्र काटा है कहीं वो मेरे काँधे पे रख लेता था सर रोता न था प्यार तो पहले भी उस सेे था मगर इतना नहीं तब मैं उस को छू तो लेता था मगर रोता न था गिर्या-ओ-ज़ारी को भी इक ख़ास मौसम चाहिए मेरी आँखें देख लो मैं वक़्त पर रोता न था
Tehzeeb Hafi
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मौसमों के तग़य्युर को भाँपा नहीं छतरियाँ खोल दीं ज़ख़्म भरने से पहले किसी ने मिरी पट्टियाँ खोल दीं हम मछेरों से पूछो समुंदर नहीं है ये इफ़रीत है तुम ने क्या सोच कर साहिलों से बँधी कश्तियाँ खोल दीं उस ने वा'दों के पर्बत से लटके हुओं को सहारा दिया उस की आवाज़ पर कोह-पैमाओं ने रस्सियाँ खोल दीं दश्त-ए-ग़ुर्बत में मैं और मिरा यार-ए-शब-ज़ाद बाहम मिले यार के पास जो कुछ भी था यार ने गठरियाँ खोल दीं कुछ बरस तो तिरी याद की रेल दिल से गुज़रती रही और फिर मैं ने थक हार के एक दिन पटरियाँ खोल दीं उस ने सहराओं की सैर करते हुए इक शजर के तले अपनी आँखों से ऐनक उतारी कि दो हिरनियाँ खोल दीं आज हम कर चुके अहद-ए-तर्क-ए-सुख़न पर रक़म दस्तख़त आज हम ने नए शाइ'रों के लिए भर्तियाँ खोल दीं
Tehzeeb Hafi
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कुछ ज़रूरत से कम किया गया है तेरे जाने का ग़म किया गया है ता-क़यामत हरे भरे रहेंगे इन दरख़्तों पे दम किया गया है इस लिए रौशनी में ठंडक है कुछ चराग़ों को नम किया गया है क्या ये कम है कि आख़िरी बोसा उस जबीं पर रक़म किया गया है पानियों को भी ख़्वाब आने लगे अश्क दरिया में ज़म किया गया है उन की आँखों का तज़्किरा कर के मेरी आँखों को नम किया गया है धूल में अट गए हैं सारे ग़ज़ाल इतनी शिद्दत से रम किया गया है
Tehzeeb Hafi
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ये सोच कर मेरा सहरा में जी नहीं लगता मैं शामिल-ए-सफ़-ए-आवारगी नहीं लगता कभी कभी तो वो ख़ुदा बन के साथ चलता है कभी कभी तो वो इंसान भी नहीं लगता यक़ीन क्यूँँ नहीं आता तुझे मेरे दिल पर ये फल कहा से तुझे मौसमी नहीं लगता मैं चाहता हूँ वो मेरी जबीं पे बोसा दे मगर जली हुई रोटी को घी नहीं लगता मैं उस के पास किसी काम से नहीं आता उसे ये काम कोई काम ही नहीं लगता
Tehzeeb Hafi
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सहरा से आने वाली हवाओं में रेत है हिजरत करूँँगा गाँव से गाँव में रेत है ऐ क़ैस तेरे दश्त को इतनी दुआएँ दीं कुछ भी नहीं है मेरी दु'आओं में रेत है सहरा से हो के बाग़ में आ हूँ सैर को हाथों में फूल हैं मिरे पाँव में रेत है मुद्दत से मेरी आँख में इक ख़्वास है मुक़ीम पानी में पेड़ पेड़ की छाँव में रेत है मुझ सा कोई फ़क़ीर नहीं है कि जिस के पास कश्कोल रेत का है सदाओं में रेत है
Tehzeeb Hafi
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