मैं बिखर गया तो सँवर गया मेरे मुंसिफ़ो को ये दुख रहा वही फ़ैसला मेरे हक़ में था जो मेरे ख़िलाफ़ किया गया
Writer
Shahid Zaki
@shahid-zaqi
1
Sher
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Ghazal
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Nazm
वो ना-समझ मुझे पत्थर समझ के छोड़ गया वो चाहता तो सितारे तराशता मुझ से
ये मुझे नींद में चलने की जो बीमारी है मुझ को इक ख़्वाब-सरा अपनी तरफ़ खींचती है
मैं तो ख़ुद बिकने को बाज़ार में आया हुआ हूँ और दुकाँ-दार ख़रीदार समझते हैं मुझे
किसी ने कहा था टूटी हुई नाव में चलो दरिया के साथ आप की रंजिश फ़ुज़ूल है
हो न हो एक ही तस्वीर के दो पहलू हैं रक़्स करता हुआ तू आग में जलता हुआ मैं
उस एक ख़त ने सुख़न-वर बना दिया मुझ को वो एक ख़त कि जो लिक्खा नहीं गया मुझ से
इतना मसरूफ़ हूँ जीने की हवस में 'शाहिद' साँस लेने की भी फ़ुर्सत नहीं होती मुझ को
ऐसा बदला हूँ तिरे शहर का पानी पी कर झूट बोलूँ तो नदामत नहीं होती मुझ को
मिरे गुनाह की मुझ को सज़ा नहीं देता मिरा ख़ुदा कहीं नाराज़ तो नहीं मुझ से
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