ghazalKuch Alfaaz

मेरे ख़ुदा किसी सूरत उसे मिला मुझ से मेरे वजूद का हिस्सा न रख जुदा मुझ से वो ना-समझ मुझे पत्थर समझ के छोड़ गया वो चाहता तो सितारे तराशता मुझ से उस एक ख़त ने सुख़न-वर बना दिया मुझ को वो एक ख़त कि जो लिक्खा नहीं गया मुझ से उसे ही साथ गवारा न था मेरा वर्ना किसे मजाल कोई उस को छीनता मुझ से अभी विसाल के ज़ख़्मों से ख़ून रिसता है अभी ख़फ़ा है मोहब्बत का देवता मुझ से है आरज़ू कि पलट जाऊँ आसमाँ की तरफ़ मिज़ाज अहल-ए-ज़मीं का नहीं मिला मुझ से ख़ता के बा'द अजब कश्मकश रही 'शाहिद' ख़ता से मैं रहा शर्मिंदा और ख़ता मुझ से

Related Ghazal

तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ

Fahmi Badayuni

249 likes

उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे

Tehzeeb Hafi

465 likes

ज़बाँ तो खोल नज़र तो मिला जवाब तो दे मैं कितनी बार लुटा हूँ मुझे हिसाब तो दे तेरे बदन की लिखावट में है उतार चढ़ाव मैं तुझे कैसे पढूँगा मुझे किताब तो दे तेरा सवाल है साक़ी कि ज़िंदगी क्या है? जवाब देता हूँ पहले मुझे शराब तो दे

Rahat Indori

190 likes

मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता

Tehzeeb Hafi

456 likes

क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा

Javed Akhtar

371 likes

More from Shahid Zaki

बस रूह सच है बाक़ी कहानी फ़रेब है जो कुछ भी है ज़मीनी ज़मानी फ़रेब है रंग अपने अपने वक़्त पे खुलते हैं आँख पर अव्वल फ़रेब है कोई सानी फ़रेब है सौदागरान-ए-शोलगी-ए-शर के दोश पर मुश्कीज़-गाँ से झाँकता पानी फ़रेब है इस घूमती ज़मीं पे दोबारा मिलेंगे हम हिजरत फ़रार नक़्ल-ए-मकानी फ़रेब है दरिया की अस्ल तैरती लाशों से पूछिए ठहराव एक चाल रवानी फ़रेब है अब शाम हो गई है तो सूरज को रोइए हम ने कहा न था कि जवानी फ़रेब है बार-ए-दिगर समय से किसी का गुज़र नहीं आइंदगाँ के हक़ में निशानी फ़रेब है इल्म इक हिजाब और हवा से आइने का ज़ंग निस्यान हक़ है याद-दहानी फ़रेब है तज्सीम कर कि ख़्वाब की दुनिया है जावेदाँ तस्लीम कर कि आलम-ए-फ़ानी फ़रेब है 'शाहिद' दारोग़-गोई-ए-गुलज़ार पर न जा तितली से पूछ रंग-फ़िशानी फ़रेब है

Shahid Zaki

0 likes

रात सी नींद है महताब उतारा जाए ऐ ख़ुदा मुझ में ज़र-ए-ख़्वाब उतारा जाए क्या ज़रूरी है कि नाव को बचाने के लिए हर मुसाफ़िर तह-ए-गिर्दाब उतारा जाए रोज़ उतरता है समुंदर में सुलगता सूरज कभी सहरा में भी तालाब उतारा जाए सौ चराग़ों के जलाने से कहीं अच्छा है इक सितारा सर-ए-मेहराब उतारा जाए पत्थरों में भी कई पेच पड़े हैं 'शाहिद' उन पे भी मौसम-ए-शादाब उतारा जाए

Shahid Zaki

2 likes

जिधर भी देखिए इक रास्ता बना हुआ है सफ़र हमारे लिए मसअला बना हुआ है मैं सर-ब-सज्दा सकूँ में नहीं सफ़र में हूँ जबीं पे दाग़ नहीं आबला बना हुआ है मैं क्या करूँँ मिरा गोशा-नशीन होना भी पड़ोसियों के लिए वाक़िआ' बना हुआ है मगर मैं इश्क़ में परहेज़ से बंधा हुआ हूँ तिरा वजूद तो ख़ुश-ज़ाएक़ा बना हुआ है बुरीदा शाख़ें हैं या शम्'अ-हा-ए-गुल-शुदा हैं ख़मीदा पेड़ है या मक़बरा बना हुआ है मिरे गुनह दर-ओ-दीवार से झलक रहे हैं मकान मेरे लिए आईना बना हुआ है शुऊरी कोशिशें मंज़र बिगाड़ देती हैं वही भला है जो बे-साख़्ता बना हुआ है किसी दुआ के लिए हाथ उठे हुए 'शाहिद' किसी दिए के लिए ताक़चा बना हुआ है

Shahid Zaki

2 likes

यूँँ तो नहीं कि पहले सहारे बनाए थे दरिया बना के उस ने किनारे बनाए थे कूज़े बनाने वाले को उजलत अजीब थी पूरे नहीं बनाए थे सारे बनाए थे अब इशरत-ओ-नशात का सामान हूँ तो हूँ हम ने तो दीप ख़ौफ़ के मारे बनाए थे दी है उसी ने प्यास बुझाने को आग भी पानी से जिस ने जिस्म हमारे बनाए थे फिर यूँँ हुआ कि उस की ज़बाँ काट दी गई वो जिस ने गुफ़्तुगू के इशारे बनाए थे सहरा पे बादलों का हुनर खुल नहीं सका क़तरे बनाए थे कि शरारे बनाए थे 'शाहिद' ख़फ़ा था कातिब-ए-तक़दीर इस लिए हम ने ज़मीं पे अपने सितारे बनाए थे

Shahid Zaki

1 likes

बिन माँगे मिल रहा हो तो ख़्वाहिश फ़ुज़ूल है सूरज से रौशनी की गुज़ारिश फ़ुज़ूल है किसी ने कहा था टूटी हुई नाव में चलो दरिया के साथ आप की रंजिश फ़ुज़ूल है नाबूद के सुराग़ की सूरत निकालिए मौजूद की नुमूद ओ नुमाइश फ़ुज़ूल है मैं आप अपनी मौत की तय्यारियों में हूँ मेरे ख़िलाफ़ आप की साज़िश फ़ुज़ूल है ऐ आसमान तेरी इनायत बजा मगर फ़सलें पकी हुई हों तो बारिश फ़ुज़ूल है जी चाहता है कह दूँ ज़मीन ओ ज़माँ से मैं मंज़िल अगर नहीं है तो गर्दिश फ़ुज़ूल है इनआम-ए-नंग-ओ-नाम मिरे काम के नहीं मज्ज़ूब हूँ सो मेरी सताइश फ़ुज़ूल है

Shahid Zaki

1 likes

Similar Writers

View All ›

Our suggestions based on Shahid Zaki.

Similar Moods

View All ›

More moods that pair well with Shahid Zaki's ghazal.