अद्ल को भी मीज़ान में रखना पड़ता है हर एहसान एहसान में रखना पड़ता है यूँँ ही ज्ञान की दौलत हाथ नहीं आती बे-ध्यानी को ध्यान में रखना पड़ता है जब भी सफ़र पर जाने लगो तो याद रहे ख़ुद को भी सामान में रखना पड़ता है अपने होने और न होने का इम्कान होनी के इम्कान में रखना पड़ता है इस नीले आकाश को छू लेने के लिए ख़ुद को ऊँची उड़ान में रखना पड़ता है यूँँ ही जंग कभी जीती नहीं जा सकती क़दम अपना मैदान में रखना पड़ता है थोड़ी देर तिलावत कर चिकने के ब'अद मोर का पर क़ुरआन में रखना पड़ता है कभी कभी तो नफ़अ के लालच में 'साहिर'! ख़ुद को किसी नुक़सान में रखना पड़ता है
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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ
Fahmi Badayuni
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ज़बाँ तो खोल नज़र तो मिला जवाब तो दे मैं कितनी बार लुटा हूँ मुझे हिसाब तो दे तेरे बदन की लिखावट में है उतार चढ़ाव मैं तुझे कैसे पढूँगा मुझे किताब तो दे तेरा सवाल है साक़ी कि ज़िंदगी क्या है? जवाब देता हूँ पहले मुझे शराब तो दे
Rahat Indori
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बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं
Rehman Faris
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वो मुँह लगाता है जब कोई काम होता है जो उस का होता है समझो ग़ुलाम होता है किसी का हो के दुबारा न आना मेरी तरफ़ मोहब्बतों में हलाला हराम होता है इसे भी गिनते हैं हम लोग अहल-ए-ख़ाना में हमारे याँ तो शजर का भी नाम होता है तुझ ऐसे शख़्स के होते हैं ख़ास दोस्त बहुत तुझ ऐसा शख़्स बहुत जल्द आम होता है कभी लगी है तुम्हें कोई शाम आख़िरी शाम हमारे साथ ये हर एक शाम होता है
Umair Najmi
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जो तेरे साथ रहते हुए सोगवार हो लानत हो ऐसे शख़्स पे और बेशुमार हो अब इतनी देर भी ना लगा, ये हो ना कहीं तू आ चुका हो और तेरा इंतिज़ार हो मैं फूल हूँ तो फिर तेरे बालो में क्यूँ नहीं हूँ तू तीर है तो मेरे कलेजे के पार हो एक आस्तीन चढ़ाने की आदत को छोड़ कर ‘हाफ़ी’ तुम आदमी तो बहुत शानदार हो
Tehzeeb Hafi
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यूँँ नहीं वो नज़र नहीं आता हम को दीदार कर नहीं आता वक़्त अच्छा ज़रूर आता है पर कभी वक़्त पर नहीं आता सिर्फ़ रोना ही मुझ को आता है और कोई हुनर नहीं आता जो भी जाता है उस के कूचे में फिर वो बार-ए-दिगर नहीं आता उस का जल्वा भी इक तमाशा है नज़र आता है पर नहीं आता उस ने जाते हुए कहा 'साहिर'! वक़्त फिर लौट कर नहीं आता
Parvez Sahir
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सौदा-ए-इश्क़ यूँ भी उतरना तो है नहीं ये ज़ख़्म-ए-रूह है इसे भरना तो है नहीं सौ बार आइना भी जो देखें तो फ़ाएदा सूरत को ख़ुद-ब-ख़ुद ही संवरना तो है नहीं मुझ को ख़बर है दहर में ज़िंदा रहूॅंगा मैं 'बुल्ल्हे' की तरह मर के भी मरना तो है नहीं जिस लहर को निगल गई इक लहर दूसरी उस लहर को दोबारा उभरना तो है नहीं तू जो यक़ीन कर ले कि वो है तो फिर वो है शय का वजूद अस्ल में वर्ना तो है नहीं धरनाई की तरह से जो धरना भी दूँ तो क्या धरती पे उस ने फिर भी उतरना तो है नहीं करता हूँ ख़ुद ही मबहस ओ तक़रीर से गुरेज़ तर्क-ए-तअ'ल्लुक़ आप से करना तो है नहीं वो जिस को अपने-आप से लगता नहीं है डर उस को ख़ुदा की ज़ात से डरना तो है नहीं क्यूँ उस के इंतिज़ार में बैठा हूँ देर से इस रह-गुज़र से उस ने गुज़रना तो है नहीं 'साहिर' ये मेरा दीदा-ए-गिर्यां है और मैं सहरा में कोई दूसरा झरना तो है नहीं
Parvez Sahir
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उम्र-भर जुस्तुजू रहेगी क्या आरज़ू आरज़ू रहेगी क्या नहीं होना मुकालिमा तुझ से ख़ुद से ही गुफ़्तुगू रहेगी क्या रात ऐ रात सिर्फ़ रात की रात मेरे पहलू में तू रहेगी क्या शोर-ए-ख़ामोशी कम नहीं होना रात-भर हाव-हू रहेगी क्या तू जो मेरे गले भी लग जाए रूह से रूह छू रहेगी क्या ख़ुद को कमरे से गर निकाल दूँ मैं कोई शय फ़ालतू रहेगी क्या यूँँ भी तज़लील कर के औरों की ख़ुद तिरी आबरू रहेगी क्या तो दोबारा सहर नहीं होनी तीरगी चार-सू रहेगी क्या ऐसी रेतीली ज़मीन में 'साहिर' मुझ को ताब-ए-नुमू रहेगी क्या
Parvez Sahir
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ब-ज़ोम-ए-ख़ुद कहीं ख़ुद से वरा न हो जाऊँ ख़ुदा-न-ख़्वास्ता मैं भी ख़ुदा न हो जाऊँ बस एक ध्यान की मैं उँगली थाम रखी है कि भीड़ में कहीं ख़ुद से जुदा न हो जाऊँ ये सोचता हूँ किसी दिल में घर करूँँ मैं भी और उस से पहले यहाँ बे-ठिकाना हो जाऊँ ये जी में आता है मेरे कि रफ़्तगाँ की तरह मैं आज मुल्क-ए-अदम को रवाना हो जाऊँ सब अहल-ए-दहर मुझे ढूँडते न रह जाएँ मैं अपनी ज़ात ही में लापता न हो जाऊँ कोई तो हो जो मुझे ज़िंदगी ही में पाए किसी के हाथ में आया ख़ज़ाना हो जाऊँ जो हो सके तो मिरे जीते-जी ही क़द्र करो मबादा मैं कोई गुज़रा ज़माना हो जाऊँ बस एक तजरबा मेरे लिए बहुत है दिला इक और इश्क़ में फिर मुब्तला न हो जाऊँ मैं इक चराग़-ए-सर-ए-रहगुज़ार हूँ 'साहिर' हवा के साथ बिल-आख़िर हवा न हो जाऊँ
Parvez Sahir
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