ब-ज़ोम-ए-ख़ुद कहीं ख़ुद से वरा न हो जाऊँ ख़ुदा-न-ख़्वास्ता मैं भी ख़ुदा न हो जाऊँ बस एक ध्यान की मैं उँगली थाम रखी है कि भीड़ में कहीं ख़ुद से जुदा न हो जाऊँ ये सोचता हूँ किसी दिल में घर करूँँ मैं भी और उस से पहले यहाँ बे-ठिकाना हो जाऊँ ये जी में आता है मेरे कि रफ़्तगाँ की तरह मैं आज मुल्क-ए-अदम को रवाना हो जाऊँ सब अहल-ए-दहर मुझे ढूँडते न रह जाएँ मैं अपनी ज़ात ही में लापता न हो जाऊँ कोई तो हो जो मुझे ज़िंदगी ही में पाए किसी के हाथ में आया ख़ज़ाना हो जाऊँ जो हो सके तो मिरे जीते-जी ही क़द्र करो मबादा मैं कोई गुज़रा ज़माना हो जाऊँ बस एक तजरबा मेरे लिए बहुत है दिला इक और इश्क़ में फिर मुब्तला न हो जाऊँ मैं इक चराग़-ए-सर-ए-रहगुज़ार हूँ 'साहिर' हवा के साथ बिल-आख़िर हवा न हो जाऊँ
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क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा
Javed Akhtar
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तुम हक़ीक़त नहीं हो हसरत हो जो मिले ख़्वाब में वो दौलत हो तुम हो ख़ुशबू के ख़्वाब की ख़ुशबू और इतने ही बेमुरव्वत हो किस तरह छोड़ दूँ तुम्हें जानाँ तुम मेरी ज़िन्दगी की आदत हो किसलिए देखते हो आईना तुम तो ख़ुद से भी ख़ूब-सूरत हो दास्ताँ ख़त्म होने वाली है तुम मेरी आख़िरी मुहब्बत हो
Jaun Elia
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तेरी मुश्किल न बढ़ाऊँगा चला जाऊँगा अश्क आँखों में छुपाऊँगा चला जाऊँगा अपनी दहलीज़ पे कुछ देर पड़ा रहने दे जैसे ही होश में आऊँगा चला जाऊँगा ख़्वाब लेने कोई आए कि न आए कोई मैं तो आवाज़ लगाऊँगा चला जाऊँगा चंद यादें मुझे बच्चों की तरह प्यारी हैं उन को सीने से लगाऊँगा चला जाऊँगा मुद्दतों बा'द मैं आया हूँ पुराने घर में ख़ुद को जी भर के रुलाऊँगा चला जाऊँगा इस जज़ीरे में ज़ियादा नहीं रहना अब तो आजकल नाव बनाऊँगा चला जाऊँगा मौसम-ए-गुल की तरह लौट के आऊँगा 'हसन' हर तरफ़ फूल खिलाऊँगा चला जाऊँगा
Hasan Abbasi
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इतना मजबूर न कर बात बनाने लग जाएँ हम तेरे सर की क़सम झूठ ही खाने लग जाएँ इतने सन्नाटे पिए मेरी समा'अत ने कि अब सिर्फ़ आवाज़ पे चाहूँ तो निशाने लग जाएँ चलिए कुछ और नहीं आह-शुमारी ही सही हम किसी काम तो इस दिल के बहाने लग जाएँ हम वो गुम-गश्त-ए-मोहब्बत हैं कि तुम तो क्या हो ख़ुद को हम ढूँडने निकलें तो ज़माने लग जाएँ ख़्वाब कुछ ऐसे दिखाए हैं फ़क़ीरी ने मुझे जिन की ता'बीर में शाहों के ख़ज़ाने लग जाएँ मैं अगर अपनी जवानी के सुना दूँ क़िस्से ये जो लौंडे हैं मिरे पाँव दबाने लग जाएँ
Mehshar Afridi
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चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ सारे मर्द एक जैसे हैं तुम ने कैसे कह डाला मैं भी तो एक मर्द हूँ तुम को ख़ुद से बेहतर मानता हूँ मैं ने उस सेे प्यार किया है मिल्कियत का दावा नहीं वो जिस के भी साथ है मैं उस को भी अपना मानता हूँ चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ
Ali Zaryoun
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यूँँ नहीं वो नज़र नहीं आता हम को दीदार कर नहीं आता वक़्त अच्छा ज़रूर आता है पर कभी वक़्त पर नहीं आता सिर्फ़ रोना ही मुझ को आता है और कोई हुनर नहीं आता जो भी जाता है उस के कूचे में फिर वो बार-ए-दिगर नहीं आता उस का जल्वा भी इक तमाशा है नज़र आता है पर नहीं आता उस ने जाते हुए कहा 'साहिर'! वक़्त फिर लौट कर नहीं आता
Parvez Sahir
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उम्र-भर जुस्तुजू रहेगी क्या आरज़ू आरज़ू रहेगी क्या नहीं होना मुकालिमा तुझ से ख़ुद से ही गुफ़्तुगू रहेगी क्या रात ऐ रात सिर्फ़ रात की रात मेरे पहलू में तू रहेगी क्या शोर-ए-ख़ामोशी कम नहीं होना रात-भर हाव-हू रहेगी क्या तू जो मेरे गले भी लग जाए रूह से रूह छू रहेगी क्या ख़ुद को कमरे से गर निकाल दूँ मैं कोई शय फ़ालतू रहेगी क्या यूँँ भी तज़लील कर के औरों की ख़ुद तिरी आबरू रहेगी क्या तो दोबारा सहर नहीं होनी तीरगी चार-सू रहेगी क्या ऐसी रेतीली ज़मीन में 'साहिर' मुझ को ताब-ए-नुमू रहेगी क्या
Parvez Sahir
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सौदा-ए-इश्क़ यूँ भी उतरना तो है नहीं ये ज़ख़्म-ए-रूह है इसे भरना तो है नहीं सौ बार आइना भी जो देखें तो फ़ाएदा सूरत को ख़ुद-ब-ख़ुद ही संवरना तो है नहीं मुझ को ख़बर है दहर में ज़िंदा रहूॅंगा मैं 'बुल्ल्हे' की तरह मर के भी मरना तो है नहीं जिस लहर को निगल गई इक लहर दूसरी उस लहर को दोबारा उभरना तो है नहीं तू जो यक़ीन कर ले कि वो है तो फिर वो है शय का वजूद अस्ल में वर्ना तो है नहीं धरनाई की तरह से जो धरना भी दूँ तो क्या धरती पे उस ने फिर भी उतरना तो है नहीं करता हूँ ख़ुद ही मबहस ओ तक़रीर से गुरेज़ तर्क-ए-तअ'ल्लुक़ आप से करना तो है नहीं वो जिस को अपने-आप से लगता नहीं है डर उस को ख़ुदा की ज़ात से डरना तो है नहीं क्यूँ उस के इंतिज़ार में बैठा हूँ देर से इस रह-गुज़र से उस ने गुज़रना तो है नहीं 'साहिर' ये मेरा दीदा-ए-गिर्यां है और मैं सहरा में कोई दूसरा झरना तो है नहीं
Parvez Sahir
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अद्ल को भी मीज़ान में रखना पड़ता है हर एहसान एहसान में रखना पड़ता है यूँँ ही ज्ञान की दौलत हाथ नहीं आती बे-ध्यानी को ध्यान में रखना पड़ता है जब भी सफ़र पर जाने लगो तो याद रहे ख़ुद को भी सामान में रखना पड़ता है अपने होने और न होने का इम्कान होनी के इम्कान में रखना पड़ता है इस नीले आकाश को छू लेने के लिए ख़ुद को ऊँची उड़ान में रखना पड़ता है यूँँ ही जंग कभी जीती नहीं जा सकती क़दम अपना मैदान में रखना पड़ता है थोड़ी देर तिलावत कर चिकने के ब'अद मोर का पर क़ुरआन में रखना पड़ता है कभी कभी तो नफ़अ के लालच में 'साहिर'! ख़ुद को किसी नुक़सान में रखना पड़ता है
Parvez Sahir
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