aflak se aata hai nalon ka javab akhir karte hain khitab akhir uthte hain hijab akhir ahval-e-mohabbat men kuchh farq nahin aisa soz o tab-o-tab avval soz o tab-o-tab akhir main tujh ko batata huun taqdir-e-umam kya hai shamshir-o-sinan avval taus-o-rubab akhir mai-khana-e-europe ke dastur nirale hain laate hain surur avval dete hain sharab akhir kya dabdaba-e-nadir kya shaukat-e-taimuri ho jaate hain sab daftar ghharq-e-mai-e-nab akhir khalvat ki ghadi guzri jalvat ki ghadi aai chhutne ko hai bijli se aghhosh-e-sahab akhir tha zabt bahut mushkil is sail-e-maani ka kah daale qalandar ne asrar-e-kitab akhir aflak se aata hai nalon ka jawab aakhir karte hain khitab aakhir uthte hain hijab aakhir ahwal-e-mohabbat mein kuchh farq nahin aisa soz o tab-o-tab awwal soz o tab-o-tab aakhir main tujh ko batata hun taqdir-e-umam kya hai shamshir-o-sinan awwal taus-o-rubab aakhir mai-khana-e-europe ke dastur nirale hain late hain surur awwal dete hain sharab aakhir kya dabdaba-e-nadir kya shaukat-e-taimuri ho jate hain sab daftar gharq-e-mai-e-nab aakhir khalwat ki ghadi guzri jalwat ki ghadi aai chhutne ko hai bijli se aaghosh-e-sahab aakhir tha zabt bahut mushkil is sail-e-maani ka kah dale qalandar ne asrar-e-kitab aakhir
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यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले
Anand Raj Singh
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चाँद सितारे फूल परिंदे शाम सवेरा एक तरफ़ सारी दुनिया उस का चर्बा उस का चेहरा एक तरफ़ वो लड़कर भी सो जाए तो उस का माथा चूमूँ मैं उस सेे मुहब्बत एक तरफ़ है उस सेे झगड़ा एक तरफ़ जिस शय पर वो उँगली रख दे उस को वो दिलवानी है उस की ख़ुशियाँ सब से अव्वल सस्ता महँगा एक तरफ़ ज़ख़्मों पर मरहम लगवाओ लेकिन उस के हाथों से चारासाज़ी एक तरफ़ है उस का छूना एक तरफ़ सारी दुनिया जो भी बोले सब कुछ शोर शराबा है सब का कहना एक तरफ़ है उस का कहना एक तरफ़ उस ने सारी दुनिया माँगी मैं ने उस को माँगा है उस के सपने एक तरफ़ है मेरा सपना एक तरफ़
Varun Anand
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ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो
Jaun Elia
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तेरी मुश्किल न बढ़ाऊँगा चला जाऊँगा अश्क आँखों में छुपाऊँगा चला जाऊँगा अपनी दहलीज़ पे कुछ देर पड़ा रहने दे जैसे ही होश में आऊँगा चला जाऊँगा ख़्वाब लेने कोई आए कि न आए कोई मैं तो आवाज़ लगाऊँगा चला जाऊँगा चंद यादें मुझे बच्चों की तरह प्यारी हैं उन को सीने से लगाऊँगा चला जाऊँगा मुद्दतों बा'द मैं आया हूँ पुराने घर में ख़ुद को जी भर के रुलाऊँगा चला जाऊँगा इस जज़ीरे में ज़ियादा नहीं रहना अब तो आजकल नाव बनाऊँगा चला जाऊँगा मौसम-ए-गुल की तरह लौट के आऊँगा 'हसन' हर तरफ़ फूल खिलाऊँगा चला जाऊँगा
Hasan Abbasi
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तुम हक़ीक़त नहीं हो हसरत हो जो मिले ख़्वाब में वो दौलत हो तुम हो ख़ुशबू के ख़्वाब की ख़ुशबू और इतने ही बेमुरव्वत हो किस तरह छोड़ दूँ तुम्हें जानाँ तुम मेरी ज़िन्दगी की आदत हो किसलिए देखते हो आईना तुम तो ख़ुद से भी ख़ूब-सूरत हो दास्ताँ ख़त्म होने वाली है तुम मेरी आख़िरी मुहब्बत हो
Jaun Elia
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अपनी जौलाँ-गाह ज़ेर-ए-आसमाँ समझा था मैं आब ओ गिल के खेल को अपना जहाँ समझा था मैं बे-हिजाबी से तिरी टूटा निगाहों का तिलिस्म इक रिदा-ए-नील-गूँ को आसमाँ समझा था मैं कारवाँ थक कर फ़ज़ा के पेच-ओ-ख़म में रह गया मेहर ओ माह ओ मुश्तरी को हम-इनाँ समझा था मैं इश्क़ की इक जस्त ने तय कर दिया क़िस्सा तमाम इस ज़मीन ओ आसमाँ को बे-कराँ समझा था मैं कह गईं राज़-ए-मोहब्बत पर्दा-दारी-हा-ए-शौक़ थी फ़ुग़ाँ वो भी जिसे ज़ब्त-ए-फ़ुग़ाँ समझा था मैं थी किसी दरमाँदा रह-रौ की सदा-ए-दर्दनाक जिस को आवाज़-ए-रहील-ए-कारवाँ समझा था मैं
Allama Iqbal
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दिगर-गूँ है जहाँ तारों की गर्दिश तेज़ है साक़ी दिल-ए-हर-ज़र्रा में ग़ोग़ा-ए-रुस्ता-ख़े़ज़ है साक़ी मता-ए-दीन-ओ-दानिश लुट गई अल्लाह-वालों की ये किस काफ़िर-अदा का ग़म्ज़ा-ए-ख़ूँ-रेज़ है साक़ी वही देरीना बीमारी वही ना-मोहकमी दिल की इलाज इस का वही आब-ए-नशात-अंगेज़ है साक़ी हरम के दिल में सोज़-ए-आरज़ू पैदा नहीं होता कि पैदाई तिरी अब तक हिजाब-आमेज़ है साक़ी न उट्ठा फिर कोई 'रूमी' अजम के लाला-ज़ारों से वही आब-ओ-गिल-ए-ईराँ वही तबरेज़ है साक़ी नहीं है ना-उमीद 'इक़बाल' अपनी किश्त-ए-वीराँ से ज़रा नम हो तो ये मिट्टी बहुत ज़रख़ेज़ है साक़ी फ़क़ीर-ए-राह को बख़्शे गए असरार-ए-सुल्तानी बहा मेरी नवा की दौलत-ए-परवेज़ है साक़ी
Allama Iqbal
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ख़िरद के पास ख़बर के सिवा कुछ और नहीं तिरा इलाज नज़र के सिवा कुछ और नहीं हर इक मक़ाम से आगे मक़ाम है तेरा हयात ज़ौक़-ए-सफ़र के सिवा कुछ और नहीं गिराँ-बहा है तो हिफ़्ज़-ए-ख़ुदी से है वर्ना गुहर में आब-ए-गुहर के सिवा कुछ और नहीं रगों में गर्दिश-ए-ख़ूँ है अगर तो क्या हासिल हयात सोज़-ए-जिगर के सिवा कुछ और नहीं उरूस-ए-लाला मुनासिब नहीं है मुझ से हिजाब कि मैं नसीम-ए-सहर के सिवा कुछ और नहीं जिसे कसाद समझते हैं ताजिरान-ए-फ़रंग वो शय मता-ए-हुनर के सिवा कुछ और नहीं बड़ा करीम है 'इक़बाल'-ए-बे-नवा लेकिन अता-ए-शोला शरर के सिवा कुछ और नहीं
Allama Iqbal
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सख़्तियाँ करता हूँ दिल पर ग़ैर से ग़ाफ़िल हूँ मैं हाए क्या अच्छी कही ज़ालिम हूँ मैं जाहिल हूँ मैं मैं जभी तक था कि तेरी जल्वा-पैराई न थी जो नुमूद-ए-हक़ से मिट जाता है वो बातिल हूँ मैं इल्म के दरिया से निकले ग़ोता-ज़न गौहर-ब-दस्त वाए महरूमी ख़ज़फ़ चैन लब साहिल हूँ मैं है मिरी ज़िल्लत ही कुछ मेरी शराफ़त की दलील जिस की ग़फ़लत को मलक रोते हैं वो ग़ाफ़िल हूँ मैं बज़्म-ए-हस्ती अपनी आराइश पे तू नाज़ाँ न हो तू तो इक तस्वीर है महफ़िल की और महफ़िल हूँ मैं ढूँढ़ता फिरता हूँ मैं 'इक़बाल' अपने-आप को आप ही गोया मुसाफ़िर आप ही मंज़िल हूँ मैं
Allama Iqbal
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कुशादा दस्त-ए-करम जब वो बे-नियाज़ करे नियाज़-मंद न क्यूँँ आजिज़ी पे नाज़ करे बिठा के अर्श पे रक्खा है तू ने ऐ वाइ'ज़ ख़ुदा वो क्या है जो बंदों से एहतिराज़ करे मिरी निगाह में वो रिंद ही नहीं साक़ी जो होशियारी ओ मस्ती में इम्तियाज़ करे मुदाम गोश-ब-दिल रह ये साज़ है ऐसा जो हो शिकस्ता तो पैदा नवा-ए-राज़ करे कोई ये पूछे कि वाइ'ज़ का क्या बिगड़ता है जो बे-अमल पे भी रहमत वो बे-नियाज़ करे सुख़न में सोज़ इलाही कहाँ से आता है ये चीज़ वो है कि पत्थर को भी गुदाज़ करे तमीज़-ए-लाला-ओ-गुल से है नाला-ए-बुलबुल जहाँ में वा न कोई चश्म-ए-इम्तियाज़ करे ग़ुरूर-ए-ज़ोहद ने सिखला दिया है वाइ'ज़ को कि बंदगान-ए-ख़ुदा पर ज़बाँ दराज़ करे हवा हो ऐसी कि हिन्दोस्ताँ से ऐ 'इक़बाल' उड़ा के मुझ को ग़ुबार-ए-रह-ए-हिजाज़ करे
Allama Iqbal
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