ghazalKuch Alfaaz

अजब सी आज-कल मैं इक परेशानी में हूँ यारो यही मुश्किल मेरी है बस मैं आसानी में हूँ यारो मुझे उन झील सी आँखों में यूँँ भी डूबना ही है न पूछो बारहा कितने में अब पानी में हूँ यारो न सूरत वस्ल की कोई न कोई हिज्र का ग़म है मैं अब के बार कुछ ऐसी ही वीरानी में हूँ यारो मुझे लगता था मुमकिन ही नहीं है उस के बिन जीना मैं ज़िंदा हूँ मगर मुद्दत से हैरानी में हूँ यारो बदन का पैरहन छोटा मुझे पड़ने लगा इतना मैं खुल कर साँस लेने को भी उर्यानी में हूँ यारो ख़ुदा ने रख दिया मुझ को उसी के दिल में जाने क्यूँँ न बाहोँ में हूँ मैं जिस की न पेशानी में हूँ यारो उसी इक 'आशना' को ढूँढती हर पल मिरी आँखें मैं रहता रात-दिन जिस की निगहबानी में हूँ यारो

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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ

Fahmi Badayuni

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बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं

Rehman Faris

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ज़बाँ तो खोल नज़र तो मिला जवाब तो दे मैं कितनी बार लुटा हूँ मुझे हिसाब तो दे तेरे बदन की लिखावट में है उतार चढ़ाव मैं तुझे कैसे पढूँगा मुझे किताब तो दे तेरा सवाल है साक़ी कि ज़िंदगी क्या है? जवाब देता हूँ पहले मुझे शराब तो दे

Rahat Indori

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इक पल में इक सदी का मज़ा हम से पूछिए दो दिन की ज़िंदगी का मज़ा हम से पूछिए भूले हैं रफ़्ता रफ़्ता उन्हें मुद्दतों में हम क़िस्तों में ख़ुद-कुशी का मज़ा हम से पूछिए आग़ाज़-ए-आशिक़ी का मज़ा आप जानिए अंजाम-ए-आशिक़ी का मज़ा हम से पूछिए जलते दियों में जलते घरों जैसी ज़ौ कहाँ सरकार रौशनी का मज़ा हम से पूछिए वो जान ही गए कि हमें उन सेे प्यार है आँखों की मुख़बिरी का मज़ा हम सेे पूछिए हँसने का शौक़ हम को भी था आप की तरह हँसिए मगर हँसी का मज़ा हम से पूछिए हम तौबा कर के मर गए बे-मौत ऐ 'ख़ुमार' तौहीन-ए-मय-कशी का मज़ा हम से पूछिए

Khumar Barabankvi

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जो तेरे साथ रहते हुए सोगवार हो लानत हो ऐसे शख़्स पे और बेशुमार हो अब इतनी देर भी ना लगा, ये हो ना कहीं तू आ चुका हो और तेरा इंतिज़ार हो मैं फूल हूँ तो फिर तेरे बालो में क्यूँ नहीं हूँ तू तीर है तो मेरे कलेजे के पार हो एक आस्तीन चढ़ाने की आदत को छोड़ कर ‘हाफ़ी’ तुम आदमी तो बहुत शानदार हो

Tehzeeb Hafi

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या तिरी आरज़ू सा हो जाऊँ या तिरी आरज़ू का हो जाऊँ मिरे कानों में जो तू कुन कह दे मैं तसव्वुर सा तिरा हो जाऊँ मुझ से इक बार ज़रा मिल ऐसे मैं तिरे घर का पता हो जाऊँ तू भी आ जाना कहीं रख के बदन जिस्म से मैं भी जुदा हो जाऊँ तोड़ कर माटी ये मेरी फिर से यूँँ बनाओ कि नया हो जाऊँ इश्क़ की रस्म यही है बाक़ी मैं भी इक बार ख़फ़ा हो जाऊँ आशनाई है सुख़न-गोई भी और कितना मैं बुरा हो जाऊँ

Vineet Aashna

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माना कि मेरा जिस्म ये जूठा गिलास है लेकिन ये दिल तो आज भी कोरा गिलास है कितनी है कैसी मय है यही बात है बड़ी चाँदी या काँच का सही रहता गिलास है कुछ तिश्नगी भी रखनी थी जानाँ सँभाल के तुम ने हिफ़ाज़तों से जो रक्खा गिलास है पीने का लुत्फ़ है तभी जब ये रहे न इल्म तेरा गिलास है कि ये मेरा गिलास है क़ीमत तो मेरी प्यास की भी कम नहीं हुज़ूर ये और बात आप का महँगा गिलास है तुम को भी इस जहान का आ ही गया चलन पीने के बा'द तुम ने भी फेंका गिलास है मुँह से लगा मैं पी गया बोतल तो शोर क्यूँ शिद्दत की प्यास को कहाँ मिलता गिलास है दुनिया का मैं ज़रूर हूँ पर शाम ही तलक फिर उस के बा'द तो मिरी दुनिया गिलास है

Vineet Aashna

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ख़ुद को समेटने में थी इतनी अगर-मगर बिखरा पड़ा हूँ आज भी तेरे इधर-उधर अपनी कमी से कह दो कि शिद्दत से तो रहे देखो कि रह न जाए कहीं कुछ कसर-वसर इक रोज़ तुम भी तो ज़रा ख़ुद से निकल मिलो तय कर लिए हैं मैं ने तो सारे सफ़र-वफ़र नफ़रत तिरी या प्यार हो ग़म हो शराब हो मुमकिन नहीं है थोड़े में अपनी गुज़र-बसर तू क्या गई मैं हो गया हूँ सख़्त-जान माँ लगती नहीं है अब तो मुझे कुछ नज़र-वज़र मुद्दत से कुछ भी तो तेरी चलती नहीं ख़ुदा रक्खा तू कर जहान की भी कुछ ख़बर-वबर बस इश्क़ का है मारा तो कुछ शे'र कह दिए वर्ना है ‘आश्ना’ में कहाँ कुछ हुनर-वुनर

Vineet Aashna

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