या तिरी आरज़ू सा हो जाऊँ या तिरी आरज़ू का हो जाऊँ मिरे कानों में जो तू कुन कह दे मैं तसव्वुर सा तिरा हो जाऊँ मुझ से इक बार ज़रा मिल ऐसे मैं तिरे घर का पता हो जाऊँ तू भी आ जाना कहीं रख के बदन जिस्म से मैं भी जुदा हो जाऊँ तोड़ कर माटी ये मेरी फिर से यूँँ बनाओ कि नया हो जाऊँ इश्क़ की रस्म यही है बाक़ी मैं भी इक बार ख़फ़ा हो जाऊँ आशनाई है सुख़न-गोई भी और कितना मैं बुरा हो जाऊँ
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ये प्यार तेरी भूल है क़ुबूल है मैं संग हूँ तू फूल है क़ुबूल है दग़ा भी दूँगा प्यार में कभी कभी कि ये मिरा उसूल है क़ुबूल है तुझे जहाँ अज़ीज़ है तो छोड़ जा मुझे ये शय फ़ुज़ूल है क़ुबूल है तू रूठेगी तो मैं मनाऊँगा नहीं जो रूल है वो रूल है क़ुबूल है लिपट ऐ शाखे गुल मगर ये सोच कर मेरा बदन बबूल है क़ुबूल है यही है गर तिरी रज़ा तो बोल फिर क़ुबूल है क़ुबूल है क़ुबूल है
Varun Anand
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नहीं था अपना मगर फिर भी अपना अपना लगा किसी से मिल के बहुत देर बा'द अच्छा लगा तुम्हें लगा था मैं मर जाऊँगा तुम्हारे बग़ैर बताओ फिर तुम्हें मेरा मज़ाक़ कैसा लगा तिजोरियों पे नज़र और लोग रखते हैं मैं आसमान चुरा लूँगा जब भी मौक़ा लगा दिखाती है भरी अलमारियाँ बड़े दिल से बताती है कि मोहब्बत में किस का कितना लगा
Tehzeeb Hafi
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तेरे जैसा कोई मिला ही नहीं कैसे मिलता कहीं पे था ही नहीं घर के मलबे से घर बना ही नहीं ज़लज़ले का असर गया ही नहीं मुझ पे हो कर गुज़र गई दुनिया मैं तिरी राह से हटा ही नहीं कल से मसरूफ़-ए-ख़ैरियत मैं हूँ शे'र ताज़ा कोई हुआ ही नहीं रात भी हम ने ही सदारत की बज़्म में और कोई था ही नहीं यार तुम को कहाँ कहाँ ढूँडा जाओ तुम से मैं बोलता ही नहीं याद है जो उसी को याद करो हिज्र की दूसरी दवा ही नहीं
Fahmi Badayuni
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पराई आग पे रोटी नहीं बनाऊँगा मैं भीग जाऊँगा छतरी नहीं बनाऊँगा अगर ख़ुदा ने बनाने का इख़्तियार दिया अलम बनाऊँगा बर्छी नहीं बनाऊँगा फ़रेब दे के तिरा जिस्म जीत लूँ लेकिन मैं पेड़ काट के कश्ती नहीं बनाऊँगा गली से कोई भी गुज़रे तो चौंक उठता हूँ नए मकान में खिड़की नहीं बनाऊँगा मैं दुश्मनों से अगर जंग जीत भी जाऊँ तो उन की औरतें क़ैदी नहीं बनाऊँगा तुम्हें पता तो चले बे-ज़बान चीज़ का दुख मैं अब चराग़ की लौ ही नहीं बनाऊँगा मैं एक फ़िल्म बनाऊँगा अपने 'सरवत' पर और इस में रेल की पटरी नहीं बनाऊँगा
Tehzeeb Hafi
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चल दिए फेर कर नज़र तुम भी ग़ैर तो ग़ैर थे मगर तुम भी ये गली मेरे दिलरुबा की है दोस्तों ख़ैरियत इधर तुम भी मुझ पे लोगों के साथ हँसते हो लोग रोएँगे ख़ास कर तुम भी मुझ को ठुकरा दिया है दुनिया ने मैं तो मर जाऊँगा अगर तुम भी उस की गाड़ी तो जा चुकी 'ताबिश' अब उठो जाओ अपने घर तुम भी
Zubair Ali Tabish
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माना कि मेरा जिस्म ये जूठा गिलास है लेकिन ये दिल तो आज भी कोरा गिलास है कितनी है कैसी मय है यही बात है बड़ी चाँदी या काँच का सही रहता गिलास है कुछ तिश्नगी भी रखनी थी जानाँ सँभाल के तुम ने हिफ़ाज़तों से जो रक्खा गिलास है पीने का लुत्फ़ है तभी जब ये रहे न इल्म तेरा गिलास है कि ये मेरा गिलास है क़ीमत तो मेरी प्यास की भी कम नहीं हुज़ूर ये और बात आप का महँगा गिलास है तुम को भी इस जहान का आ ही गया चलन पीने के बा'द तुम ने भी फेंका गिलास है मुँह से लगा मैं पी गया बोतल तो शोर क्यूँ शिद्दत की प्यास को कहाँ मिलता गिलास है दुनिया का मैं ज़रूर हूँ पर शाम ही तलक फिर उस के बा'द तो मिरी दुनिया गिलास है
Vineet Aashna
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ख़ुद को समेटने में थी इतनी अगर-मगर बिखरा पड़ा हूँ आज भी तेरे इधर-उधर अपनी कमी से कह दो कि शिद्दत से तो रहे देखो कि रह न जाए कहीं कुछ कसर-वसर इक रोज़ तुम भी तो ज़रा ख़ुद से निकल मिलो तय कर लिए हैं मैं ने तो सारे सफ़र-वफ़र नफ़रत तिरी या प्यार हो ग़म हो शराब हो मुमकिन नहीं है थोड़े में अपनी गुज़र-बसर तू क्या गई मैं हो गया हूँ सख़्त-जान माँ लगती नहीं है अब तो मुझे कुछ नज़र-वज़र मुद्दत से कुछ भी तो तेरी चलती नहीं ख़ुदा रक्खा तू कर जहान की भी कुछ ख़बर-वबर बस इश्क़ का है मारा तो कुछ शे'र कह दिए वर्ना है ‘आश्ना’ में कहाँ कुछ हुनर-वुनर
Vineet Aashna
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अजब सी आज-कल मैं इक परेशानी में हूँ यारो यही मुश्किल मेरी है बस मैं आसानी में हूँ यारो मुझे उन झील सी आँखों में यूँँ भी डूबना ही है न पूछो बारहा कितने में अब पानी में हूँ यारो न सूरत वस्ल की कोई न कोई हिज्र का ग़म है मैं अब के बार कुछ ऐसी ही वीरानी में हूँ यारो मुझे लगता था मुमकिन ही नहीं है उस के बिन जीना मैं ज़िंदा हूँ मगर मुद्दत से हैरानी में हूँ यारो बदन का पैरहन छोटा मुझे पड़ने लगा इतना मैं खुल कर साँस लेने को भी उर्यानी में हूँ यारो ख़ुदा ने रख दिया मुझ को उसी के दिल में जाने क्यूँँ न बाहोँ में हूँ मैं जिस की न पेशानी में हूँ यारो उसी इक 'आशना' को ढूँढती हर पल मिरी आँखें मैं रहता रात-दिन जिस की निगहबानी में हूँ यारो
Vineet Aashna
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