ये प्यार तेरी भूल है क़ुबूल है मैं संग हूँ तू फूल है क़ुबूल है दग़ा भी दूँगा प्यार में कभी कभी कि ये मिरा उसूल है क़ुबूल है तुझे जहाँ अज़ीज़ है तो छोड़ जा मुझे ये शय फ़ुज़ूल है क़ुबूल है तू रूठेगी तो मैं मनाऊँगा नहीं जो रूल है वो रूल है क़ुबूल है लिपट ऐ शाखे गुल मगर ये सोच कर मेरा बदन बबूल है क़ुबूल है यही है गर तिरी रज़ा तो बोल फिर क़ुबूल है क़ुबूल है क़ुबूल है
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चाँद सितारे फूल परिंदे शाम सवेरा एक तरफ़ सारी दुनिया उस का चर्बा उस का चेहरा एक तरफ़ वो लड़कर भी सो जाए तो उस का माथा चूमूँ मैं उस सेे मुहब्बत एक तरफ़ है उस सेे झगड़ा एक तरफ़ जिस शय पर वो उँगली रख दे उस को वो दिलवानी है उस की ख़ुशियाँ सब से अव्वल सस्ता महँगा एक तरफ़ ज़ख़्मों पर मरहम लगवाओ लेकिन उस के हाथों से चारासाज़ी एक तरफ़ है उस का छूना एक तरफ़ सारी दुनिया जो भी बोले सब कुछ शोर शराबा है सब का कहना एक तरफ़ है उस का कहना एक तरफ़ उस ने सारी दुनिया माँगी मैं ने उस को माँगा है उस के सपने एक तरफ़ है मेरा सपना एक तरफ़
Varun Anand
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क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा
Javed Akhtar
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ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो
Jaun Elia
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मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता
Tehzeeb Hafi
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कैसे उस ने ये सब कुछ मुझ सेे छुप कर बदला चेहरा बदला रस्ता बदला बा'द में घर बदला मैं उस के बारे में ये कहता था लोगों से मेरा नाम बदल देना वो शख़्स अगर बदला वो भी ख़ुश था उस ने दिल देकर दिल माँगा है मैं भी ख़ुश हूँ मैं ने पत्थर से पत्थर बदला मैं ने कहा क्या मेरी ख़ातिर ख़ुद को बदलोगे और फिर उस ने नज़रें बदलीं और नंबर बदला
Tehzeeb Hafi
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कहीं न ऐसा हो अपना वक़ार खा जाए ख़िज़ाँ से फूल बचाएँ बहार खा जाए हमारे जैसा कहाँ दिल किसी का होगा भला जो दर्द पाले रखे और क़रार खा जाए पलट के संग तिरी और फेंक सकता हूँ कि मैं वो क़ैस नहीं हाँ जो मार खा जाए उसी का दाख़िला इस दश्त में करो अब से जो सब्र पी सके अपना ग़ुबार खा जाए बहुत क़रार है थोड़ी सी बे-क़रारी दे कहीं न ऐसा हो मुझ को क़रार खा जाए अजब सफ़ीना है ये वक़्त का सफ़ीना भी जो अपनी गोद में बैठा सवार खा जाए
Varun Anand
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सखी के पाँव में मेहँदी लगी है मुई के पाँव में मेहँदी लगी है उदासी साथ चलती है हमारे ख़ुशी के पाँव में मेहँदी लगी है सभी कहने को मेरे हम-क़दम हैं सभी के पाँव में मेहँदी लगी है वो जिस के साथ घर से भागना था उसी के पाँव में मेहँदी लगी है समुंदर से कहो ख़ुद आए मिलने नदी के पाँव में मेहँदी लगी है किसी के पाँव भीगे हैं लहू से किसी के पाँव में मेहँदी लगी है
Varun Anand
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मरहम के नहीं हैं ये तरफ़-दार नमक के निकले हैं मिरे ज़ख़्म तलबगार नमक के आया कोई सैलाब कहानी में अचानक और घुल गए पानी में वो किरदार नमक के दोनों ही किनारों पे थी बीमारों की मज्लिस इस पार थे मीठे के तो उस पार नमक के उस ने ही दिए ज़ख़्म ये गर्दन पे हमारी फिर उस ने ही पहनाए हमें हार नमक के कहती थी ग़ज़ल मुझ को है मरहम की ज़रूरत और देते रहे सब उसे अश'आर नमक के जिस सम्त मिला करती थीं ज़ख़्मों की दवाएँ सुनते हैं कि अब हैं वहाँ बाज़ार नमक के
Varun Anand
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ये सुन कर हर कोई हैरान है अब तू मेरी जाँ, किसी की जान है अब मिला कर ख़ाक में अरमाँ हमारे वो पूछे है कोई अरमान है अब तिरे कांधे की पहले शाल थी जो हमारे घर का दस्तर-ख़्वान है अब सभी से सरसरी रिश्ता ही रक्खो मुहब्बत में बड़ा नुक़सान है अब नहीं पहचानता अब कोई मुझ को यही मेरी नई पहचान है अब वो झूटा था मिरा महबूब पहले जो इक आला सियासत-दान है अब उसे कुन कहने की लत पड़ गई है उसे लगता है वो भगवान है अब चलो जाओ हमारा हाथ छोड़ो तुम्हारा रास्ता आसान है अब
Varun Anand
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ख़ुद अपने ख़ून में पहले नहाएा जाता है वक़ार ख़ुद नहीं बनता बनाया जाता है कभी कभी जो परिंदे भी अन-सुना कर दें तो हाल दिल का शजर को सुनाया जाता है हमारी प्यास को ज़ंजीर बाँधी जाती है तुम्हारे वास्ते दरिया बहाएा जाता है नवाज़ता है वो जब भी अज़ीज़ों को अपने तो सब से बा'द में हम को बुलाया जाता है हमीं तलाश के देते हैं रास्ता सब को हमीं को बा'द में रास्ता दिखाया जाता है
Varun Anand
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