अक़्ल गो आस्ताँ से दूर नहीं उस की तक़दीर में हुज़ूर नहीं दिल-ए-बीना भी कर ख़ुदा से तलब आँख का नूर दिल का नूर नहीं इल्म में भी सुरूर है लेकिन ये वो जन्नत है जिस में हूर नहीं क्या ग़ज़ब है कि इस ज़माने में एक भी साहब-ए-सुरूर नहीं इक जुनूँ है कि बा-शुऊर भी है इक जुनूँ है कि बा-शुऊर नहीं ना-सुबूरी है ज़िंदगी दिल की आह वो दिल कि ना-सुबूर नहीं बे-हुज़ूरी है तेरी मौत का राज़ ज़िंदा हो तू तो बे-हुज़ूर नहीं हर गुहर ने सदफ़ को तोड़ दिया तू ही आमादा-ए-ज़ुहूर नहीं अरिनी मैं भी कह रहा हूँ मगर ये हदीस-ए-कलीम-ओ-तूर नहीं
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यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले
Anand Raj Singh
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क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा
Javed Akhtar
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ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो
Jaun Elia
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तेरी मुश्किल न बढ़ाऊँगा चला जाऊँगा अश्क आँखों में छुपाऊँगा चला जाऊँगा अपनी दहलीज़ पे कुछ देर पड़ा रहने दे जैसे ही होश में आऊँगा चला जाऊँगा ख़्वाब लेने कोई आए कि न आए कोई मैं तो आवाज़ लगाऊँगा चला जाऊँगा चंद यादें मुझे बच्चों की तरह प्यारी हैं उन को सीने से लगाऊँगा चला जाऊँगा मुद्दतों बा'द मैं आया हूँ पुराने घर में ख़ुद को जी भर के रुलाऊँगा चला जाऊँगा इस जज़ीरे में ज़ियादा नहीं रहना अब तो आजकल नाव बनाऊँगा चला जाऊँगा मौसम-ए-गुल की तरह लौट के आऊँगा 'हसन' हर तरफ़ फूल खिलाऊँगा चला जाऊँगा
Hasan Abbasi
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तुम हक़ीक़त नहीं हो हसरत हो जो मिले ख़्वाब में वो दौलत हो तुम हो ख़ुशबू के ख़्वाब की ख़ुशबू और इतने ही बेमुरव्वत हो किस तरह छोड़ दूँ तुम्हें जानाँ तुम मेरी ज़िन्दगी की आदत हो किसलिए देखते हो आईना तुम तो ख़ुद से भी ख़ूब-सूरत हो दास्ताँ ख़त्म होने वाली है तुम मेरी आख़िरी मुहब्बत हो
Jaun Elia
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सख़्तियाँ करता हूँ दिल पर ग़ैर से ग़ाफ़िल हूँ मैं हाए क्या अच्छी कही ज़ालिम हूँ मैं जाहिल हूँ मैं मैं जभी तक था कि तेरी जल्वा-पैराई न थी जो नुमूद-ए-हक़ से मिट जाता है वो बातिल हूँ मैं इल्म के दरिया से निकले ग़ोता-ज़न गौहर-ब-दस्त वाए महरूमी ख़ज़फ़ चैन लब साहिल हूँ मैं है मिरी ज़िल्लत ही कुछ मेरी शराफ़त की दलील जिस की ग़फ़लत को मलक रोते हैं वो ग़ाफ़िल हूँ मैं बज़्म-ए-हस्ती अपनी आराइश पे तू नाज़ाँ न हो तू तो इक तस्वीर है महफ़िल की और महफ़िल हूँ मैं ढूँढ़ता फिरता हूँ मैं 'इक़बाल' अपने-आप को आप ही गोया मुसाफ़िर आप ही मंज़िल हूँ मैं
Allama Iqbal
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दिगर-गूँ है जहाँ तारों की गर्दिश तेज़ है साक़ी दिल-ए-हर-ज़र्रा में ग़ोग़ा-ए-रुस्ता-ख़े़ज़ है साक़ी मता-ए-दीन-ओ-दानिश लुट गई अल्लाह-वालों की ये किस काफ़िर-अदा का ग़म्ज़ा-ए-ख़ूँ-रेज़ है साक़ी वही देरीना बीमारी वही ना-मोहकमी दिल की इलाज इस का वही आब-ए-नशात-अंगेज़ है साक़ी हरम के दिल में सोज़-ए-आरज़ू पैदा नहीं होता कि पैदाई तिरी अब तक हिजाब-आमेज़ है साक़ी न उट्ठा फिर कोई 'रूमी' अजम के लाला-ज़ारों से वही आब-ओ-गिल-ए-ईराँ वही तबरेज़ है साक़ी नहीं है ना-उमीद 'इक़बाल' अपनी किश्त-ए-वीराँ से ज़रा नम हो तो ये मिट्टी बहुत ज़रख़ेज़ है साक़ी फ़क़ीर-ए-राह को बख़्शे गए असरार-ए-सुल्तानी बहा मेरी नवा की दौलत-ए-परवेज़ है साक़ी
Allama Iqbal
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अपनी जौलाँ-गाह ज़ेर-ए-आसमाँ समझा था मैं आब ओ गिल के खेल को अपना जहाँ समझा था मैं बे-हिजाबी से तिरी टूटा निगाहों का तिलिस्म इक रिदा-ए-नील-गूँ को आसमाँ समझा था मैं कारवाँ थक कर फ़ज़ा के पेच-ओ-ख़म में रह गया मेहर ओ माह ओ मुश्तरी को हम-इनाँ समझा था मैं इश्क़ की इक जस्त ने तय कर दिया क़िस्सा तमाम इस ज़मीन ओ आसमाँ को बे-कराँ समझा था मैं कह गईं राज़-ए-मोहब्बत पर्दा-दारी-हा-ए-शौक़ थी फ़ुग़ाँ वो भी जिसे ज़ब्त-ए-फ़ुग़ाँ समझा था मैं थी किसी दरमाँदा रह-रौ की सदा-ए-दर्दनाक जिस को आवाज़-ए-रहील-ए-कारवाँ समझा था मैं
Allama Iqbal
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मता-ए-बे-बहा है दर्द-ओ-सोज़-ए-आरज़ूमंदी मक़ाम-ए-बंदगी दे कर न लूँ शान-ए-ख़ुदावंदी तिरे आज़ाद बंदों की न ये दुनिया न वो दुनिया यहाँ मरने की पाबंदी वहाँ जीने की पाबंदी हिजाब इक्सीर है आवारा-ए-कू-ए-मोहब्बत को मिरी आतिश को भड़काती है तेरी देर-पैवंदी गुज़र-औक़ात कर लेता है ये कोह ओ बयाबाँ में कि शाहीं के लिए ज़िल्लत है कार-ए-आशियाँ-बंदी ये फ़ैज़ान-ए-नज़र था या कि मकतब की करामत थी सिखाए किस ने इस्माईल को आदाब-ए-फ़रज़ंदी ज़ियारत-गाह-ए-अहल-ए-अज़्म-ओ-हिम्मत है लहद मेरी कि ख़ाक-ए-राह को मैं ने बताया राज़-ए-अलवंदी मिरी मश्शातगी की क्या ज़रूरत हुस्न-ए-मअ'नी को कि फ़ितरत ख़ुद-ब-ख़ुद करती है लाले की हिना-बंदी
Allama Iqbal
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दिल सोज़ से ख़ाली है निगह पाक नहीं है फिर इस में अजब क्या कि तू बेबाक नहीं है है ज़ौक़-ए-तजल्ली भी इसी ख़ाक में पिन्हाँ ग़ाफ़िल तू निरा साहिब-ए-इदराक नहीं है वो आँख कि है सुर्मा-ए-अफ़रंग से रौशन पुरकार ओ सुख़न-साज़ है नमनाक नहीं है क्या सूफ़ी ओ मुल्ला को ख़बर मेरे जुनूँ की उन का सर-ए-दामन भी अभी चाक नहीं है कब तक रहे महकूमी-ए-अंजुम में मिरी ख़ाक या मैं नहीं या गर्दिश-ए-अफ़्लाक नहीं है बिजली हूँ नज़र कोह ओ बयाबाँ पे है मेरी मेरे लिए शायाँ ख़स-ओ-ख़ाशाक नहीं है आलम है फ़क़त मोमिन-ए-जाँबाज़ की मीरास मोमिन नहीं जो साहिब-ए-लौलाक नहीं है
Allama Iqbal
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